Modern Meera

Abstract


4.5  

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अनोखी का गुड्डा

अनोखी का गुड्डा

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सत्रह साल की अनोखी, अभी तक गुड्डे गुडियो से खेला करती है। वैसे तो बाकी सब काम उम्र के हिसाब से कही बढ़कर करती है , बस ये वाली बात है जो किसी को समझ नहीं आती। खासकर माँ से आये दिन डांट पड़ती है उसको। छोटी उम्र से ही हर साल जब भी अनोखी को मेले जाने का मौका मिलता , कुछ न कुछ जिद ठान के अपने गुड़िया घर के सामन खरीदवा लेती। कभी ड्रेसर , कभी कपडे, तो कभी छोटे छोटे जूते चप्पल। कपडे हुए गहने तो वो खुद ही बना लेती थी। अब बच्ची थी तो ठीक था लेकिन पिछले ४-५ सालो से ये वाली आदत खटकने लगी थी माँ और पिताजी को। 

पिताजी अक्सर रात में माँ को कोसते की तुम्ही ने ध्यान नहीं रखा। माँ का कभी उतरा चेहरा तो कभी गुस्सावाला , दोनों ही अनोखी को गवारा नहीं होते। लेकिन मन नहीं मानता की सब कुछ फेक फाक दे और हाथ धो ले अपने एकलौते शौक से। पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती है , गाना भी गाती है, पिछले महीने पेंटिंग कॉम्पिटिशन भी जीत आयी है और कविता कहानी तो हर साल छपा करती है उसके स्कूल के मैगज़ीन में। बारहवीं में पढ़ती है और गुड्डे गुडियो का शौक ? अब क्या करे। है तो है। 

परसो से मौसी आयी हुयी है और ऐसा लगता है माँ और मौसी को अनोखी की शिकायत के अलावा कुछ काम ही नहीं। कैसे बाल रखे हैं? कैसे कपडे पहन रखे है? ठीक से बैठो ? वहां मत बैठो? शादी के बाद कैसे निबाह होगा इसका। यहाँ तक की, मौसी तो कहती है की इसका नाम ही तुमने अनोखी क्यों रखा, अब भुगतो। 

ऐसे में अनोखी के बिस्तर के नीचे पड़ा छोटा टिन का बक्सा और बक्से में बसी उसके गुड़ियों की दुनिया जैसे ताज़ी हवा का काम करती है। इसको भी फेंक दूँ? जियूँगी कैसे मैं भला। एक तो माँ की हज़ार पाबंदियां है घर से निकलने पर और अब इनसे भी बाते न करूँ? ज्यादती नहीं है ये ? 

रोज़ कंप्यूटर लैब में काम करते करते , उसके दिमाग में दस बार ये ख्याल आता है की कही ये बक्सा माँ के हाथ न लग जाए और वो फेंक ही न दे सब कुछ। ऊपर से जब मौसी आती है , टेंशन दुगनी हो जाती है। 

अभी भी फाइनल प्रोजेक्ट पे काम कर रही है और घडी घडी दिमाग भटका हुआ है, ये बात विनय की नजरो से छुपती नहीं। विनय नया आया है क्लास में , कुछ ६ महीने हुए होंगे उसके परिवार को इस शहर में। तबादला हुआ है कही से, इसीलिए ज्यादा दोस्त नहीं बने उसके। और पहले ही दिन जब वो आया था, कुछ खास देख लिया था उसने अनोखी में। तब से कुछ न कुछ बहाने करके उसके इर्द गिर्द मंडराता रहता है। अनोखी के साथ ऐसा पहले कभी हुआ नहीं। 

इसी शहर में पैदा हुयी है, बड़ी भी और लगभग क्लास में सभी उसे बस एक इंटेलीजेंट पर झल्ली लड़की की तरह देखते हैं। अच्छा सा लगता है अनोखी को ,विनय का उसे इस तरह खोजते हुए पहुँच जाना कभी लैब में तो कभी लाइब्रेरी में। परसो तो हद ही हो गयी, जब विनय ने उसके साथ प्रोजेक्ट करने की रिक्वेस्ट कर दी टीचर से और टीचर ने हामी भर दी। अब तो इसके साथ ५-६ घंटे बैठे रहना पड़ेगा मुझे रोज़। खैर, इसमें कुछ बुराई तो नहीं। बाते ज्यादा नहीं करता पर करता है तो पते की। सोच कर थोड़ी हंसी आ गयी और कुछ पल को अनोखी भूल जाती है घर की टेंशन। 

जनवरी का महीना है, लैब में आज सात कब और कैसे बज़ गए, पता ही नहीं चला। बाहर निकली तो अँधेरा हो रखा था, एक मिनट को चिंता हो गयी अनोखी को की अब घर कैसे जाउंगी। लेकिन उसके बोलने से पहले ही विनय ने गुहार लगा दी, चलो मैं छोड़ आता हूँ न। अनोखी ने सोचा , एक से भले दो। दोनों पैदल ही निकल पड़े, और रस्ते भर न जाने क्या क्या बातें चलती रही। घर कब आ गया पता ही नहीं चला। यहाँ तक की, गेट पर खड़े खड़े बड़े देर तक बाते करते रहे दोनों। कभी फिल्मो की, कभी शहरों की, कभी दोस्तों की, कभी किसी कहानी और कविता की।

एक बात का सिरा दूसरी से जुड़ता और दूसरा तीसरी से, और बस बनता चला गया बातो का कारवां। 

इतने में मौसी बाहर बरामदे में आ गयी, और अजीब से देखा उन्होंने दोनों को। अनोखी अब तक जैसे किसी और दुनिया में खो गयी थी , धम्म से जमीं पर गिरी। 

धीरे से विनय को बाई बोला और अंदर चली गयी। 

आज माँ और मौसी दोनों बड़े खामोश से थे। अनोखी ने उसी ख़ामोशी में खाना खाया और अपने कमरे में चली गयी। 

सोने से पहले वो रोज़ ही अपने गुड्डे गुडियो से थोड़ी बात ज़रूर करती है और आज तो उसे उनको बताना भी है विनय के बारे में। कितनी बाते करता है वो, कितना हंसाता भी है अनोखी को और तो और उतना ही इंटेलीजेंट भी है। 

जैसे ही अनोखी ने बिस्तर के नीचे अपनी गर्दन झुकाई , दिमाग सुन्न सा हो गया। पहले उसने सोचा, अँधेरे में नहीं दिख रहा। तुरंत अपनी टोर्च जलाई, लेकिन बक्सा कही भी नहीं था। 

आँखों से आंसू अपने आप ही बहने लगे, गुस्से में चेहरा लाल हुआ जा रहा था और उसे यकीं था आज उसका डर सच हो गया 

माँ ! माँ !

कहाँ हो तुम 

ये इतनी रात गए शोर क्यों मचा रही हो ?

तुम्हे पता है क्यों? मेरे कमरे में कौन गया था ? 

क्यों? क्या हुआ है ?

माँ की आँखों में उसका व्यङ्ग अनोखी साफ़ पढ़ रही थी। और पास ही बैठी मौसी पान लगा रही थी लेकिन बन ऐसे रही थी वहां हो ही नहीं। गुस्से और दुःख से सर और कलेजा लग रहा था दोनों फट जायेगा, लेकिन जानती थी ये दोनों ही न कुछ जवाब देंगी और न अब कुछ उपाय है। 

पैर पटकती अनोखी कमरे से निकल गयी और धड़ाम अपने बिस्तर पर गिर कर सुबकने लगी। कमरे से निकलते हुए उसने सुना मौसी की दबी हुयी हंसी में कहते हुए कटाक्ष के बोल "जवान लड़को के संग घूम रही है और घर में गुड्डे गुडिये चाहिए हमारी लाडो को "। 

क्रोध तो बहुत था पर शोक उससे कही गहरा। शायद अब सच में मेरे गुड्डे गुडियो से खेलने के दिन ख़तम हो गए। देर रात उसने डायरी में लिख रखी वो सारी बातें जो उसको कहनी थी। डायरी को कलेजे से लगाए न जाने कब उसे नींद आ गयी। 

सुबह उठी तो भी ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना सदा के लिए बिछड़ गया हो। माँ बोलती रही , पर न उसने नास्ता किया न रुकी। बस ये कह कर की प्रजेक्ट में बहुत काम है , वो ९ बजे तैयार हो कर सीधी कॉलेज आ गयी। लैब सुबह खाली होती है, मुझे चैन से काम करने को मिलेगा। 

अनोखी चौंक गयी , जब उसने देखा विनय पहले से ही पहुँचा हुआ था लैब में और कंप्यूटर के पास रखा था उसका बस एक गुड्डा। 

देखते ही अनोखी दौड़ पड़ी और उसे उठा लिया। आँखों में आंसू भर आये और पूछा उसने। 

"ये कहां मिला"

"तुम्हारे घर के बाहर, कल"

"तुम्हे कैसे पता की ये मेरा है" अनोखी थोड़ा झेंपकर बोली। 

"जैसे ही मैं तुम्हे छोड़ कर मुड़ा , मेरा पैर टकराया किसी चीज़ से, देखा तो एक पुराना टिन का बक्सा था। खुला हुआ लेकिन कचरे की पेटी के पास। उसपर अंदर तुम्हारा लिखा नाम साफ़ दिख रहा था।" 

अनोखी सोचने लगी, हाँ। शायद तीसरी में थी तब जब उसने बड़े बड़े से अंदर प्रोट्रेक्टर के पिन से आंक दिया था बक्से पे अपना नाम। 

 "मैंने आस पास देखा, लेकिन बाकि सब कुछ तो कचरे में सना था, बस ये थोड़े दूर में गिरा था तो मैं उठा लाया। कल रात बहुत देर हो गयी थी तो वापस आया नहीं देने, आज सात बजे से ही यहाँ बैठा हूँ की कब तुम आओ और दे दूँ" 

शायद विनय ने भांप लिया था मौसी की नज़र को कल रात और अच्छा किया जो वापस घर नहीं आया। न जाने क्या क्या किस्से बनाती वो। 

गुड्डे को चुपचाप अनोखी ने अपने बैग में डाल लिया। 

"अरे , ये भी ले लो न। "

अनोखी ने पलट कर देखा तो , विनय के हाथ में एक छोटी सी टोपी थी एकदम गुड्डे के साइज की। 

" मेरे पास बस यही बचा है, मेरे बचपन का। सम्हाल के रखना , तुम्हारे गुड्डे को एकदम फिट होगी , मैंने ट्राई भी किया है "

विनय ने अनोखी की हथेली खोल कर उसपे टोपी रखी और मुट्ठी को बंद कर दिया। उसकी मुट्ठी को कस के रखा अपने मुट्ठी के अंदर कुछ पल। अनोखी एकटक देखटी रह गयी उसकी आँखों में। 

यही तो था, अनोखी का गुड्डा। 


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