Modern Meera

Classics


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माजरा क्या है?

माजरा क्या है?

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मीरा आजकल ज्यादातर लोगो से नहीं मिलती।कहती है , अब ऐसे लोगो से क्या मिलना और क्या बातें करना जिनको न कुछ सुनना है न देखना है बस अपनी हाँके जाना है. ऐसे लोगो से मिलकर लगता है खोखले हो गए भीतर तक. नोच खाते हैं ऐसे लोग मीरा के मन की शांति , जो उसे बड़ी प्यारी है। और हो भी क्यों न, इतने संघर्ष के बाद जो पायी है. इसे व्यर्थ कर दूँ , क्युकी किसी ने जिद कर के बुला लिया कहीं? न बाबा न. अब तो स्वार्थी होना पड़ेगा। 


कहने को रानी मीरा , लेकिन न तो गहने कपडे का शौक है न ही नौकर चाकर या हाथी घोड़े का। सारा दिन चेहरे पर हलकी सी मुस्कान लिए अपनी दिनचर्या कर लेना और शाम होते ही बैठ जाना अपने कृष्ण की मंदिर की द्वार पर. बस एक तानपुरे और कई खाली पन्नो के साथ, कभी बजाना , कभी लिखना और कभी झूम झूम कर नाच उठना , तब तक जबतक शरीर थककर वही भूमि पर सो न जाए. 


लोगो को लगता है , मीरा थोड़ा लोगो से बात चीत करेगी, बाजार घूमेगी तो शायद ध्यान बंटा रहेगा। लेकिन यही तो नहीं करना है मीरा को, ध्यान बांटू क्यों ? ये सारा का सारा ध्यान ही तो है जो या तो मेरा है या मेरे कृष्णा का. इससे ज्यादा प्रिय मुझे कुछ भी नहीं. 


पहले तो मीरा बहाने बनाया करती थी , आजकल तो अलबत्ता सीधे सीधे मना कर देती है. कुछ दिन में तो लगता है लोग तीज त्यौहार में भी बुलाना बंद कर देंगे. और जब कोई यही बात उसको समझाने आता है , वो जोर जोर से हंसने लगती है. कौन बात करे अब इससे। 


आज तो मैं पूछ कर रहूंगी, चाहती क्या है ये? सहेली है मेरी, कभी तो मेरी बात सुनेगी। और धमकती हुयी मैं उसके महल को चल पड़ी. 


कमरे से हलकी सी रौशनी आ रही है और मीरा वही खिड़की के किनारे बैठी कुछ पढ़ रही है। चेहरे पर ढलता सूरज चमक रहा है की मीरा की कांति से सूरज, कोई नहीं जान सकता। 


"सखी तुम?"


मुझे देखकर उसके चेहरे की चमक और बढ़ जाती है , इतनी की मेरी आंखे ही चुंधिया गयी. 


"काहे की सखी? देखने तक नहीं आती की जी रही हूँ या मर गयी?"


"अरे , ऐसा थोड़े न है. तुम तो बड़ी प्यारी हो मुझे , न होती तो क्यों आती आज साँझ ढले मिलने ? है न "


"मैं आयी, तू तो न आयी? ऐसा क्या करती है जो सखी की भी खोज न रहती तुझको ? "


"तू तो जानती ही है , मुझे कहाँ रहती है कोई सुध बुध। पर तुझे देख के तसल्ली सी हो रही , भला सा लग रहा मुझे। "


"चल चल, तू बड़ी कवी और तेरी लच्छेदार बाते। मुझे समझ न आती। बस ये बोलने आयी हूँ की अगले हफ्ते व्याह है बिटिया का. आज रात से संगीत रखा है , चल तू मेरे संग. अभी के अभी "


"अभी कैसे जाऊँगी ? अभी तो शाम की मेरी आरती भी न हुयी और कान्हा को इतने देर न छोड़ सकूं मैं "


"जा मर, तेरे पत्थर के कान्हा इस हाड मांस की सखी से बड़े हो रखे न अब? "


"अरी रूठ मत, आ जाऊंगी थोड़े देर में. तू ही रुक जा न थोड़े देर , देख ले मेरे कान्हा की आरती फिर चल पड़ूँगी तेरे संग."


ठीक है , आज देख ही लेती हूँ. मैंने भी सोच लिया की आखिर माजरा क्या है पता तो चले, इस भक्ति भक्ति के अलाप का लो मीरा ने लगाए रखी है.


सूरज आसमान में ढल गया है और हाथो में दीप जलाये मीरा अपने मंदिर में खड़ी है. मैं भी उसके पीछे खड़ी होकर देख रही हूँ. दीप को प्रतिमा के पास रख जमीन पर बैठ जाती है मीरा और निकाल लेती है अपना तानपुरा। मूरत देख नहीं पाती मैं, परदे से आड़ हो गयी है , मैं तो देख रही हूँ दीवार से लगी मीरा , भावविभोर अपनी संध्या आरती को प्रस्तुत अपने सांवरे के समक्ष।


"सांवरे रंग राची। .. हूँ तो। ... बाँध घुँघरा "


अरे , ये घुंघरुओं की आवाज कहाँ से आ रही है. मीरा तो बस आंखे बंद किये गा रही है। मैं भी , क्या क्या सुन रही हूँ। 


"कुंजन कुंजन फिरत राधिका , शब्द सुनत मुरली को.... " 


हाय , सच में मुरली की धुन भी सुन रही हूँ मैं तो. ऐसे कैसे हो सकता है. मैं आंखे मींचे एकपर और बैठती हूँ पर न घुँघरू की आवाज मंद होती है न बांसुरी की. मीरा मेरे सामने ही है और उसकी उंगलियां तानपुरे पर. कौतुहल और विस्मय से शरीर कांपने से लग रहा है, आत्मा जानती है मेरी सखी मीरा मेरी सखी ही है और सच भी, लेकिन उस सच का क्या जितना मैं आँखों से देख रही हूँ और कानो से सुन रही हूँ। 

झट से खींच देती हूँ द्वार का पर्दा, मीरा का ध्यान भांग नहीं होता। पर मेरे सामने होते है साक्षात कृष्ण मंद मंद मुस्काते, बांसुरी बजाते और जमीन पर रखे घुँघरूओ को बीच बीच में हलकी से थाप देते। न वो मुझे देखते हैं, न मीरा। भक्त कौन और भगवान कौन? कौन जाने ? 


सच तो यही है, जान गयी थी मैं. 


ये दोनों ही है यथार्थ में , एक दूजे के साथ सदैव सर्वत्र. मैं तो कुछ हूँ ही नहीं , एक माया भर का पाखण्ड। एक क्षण में युग गुजर जाता है , कृष्ण मीरा मेरी नजरो के सामने एक दूसरे में विलीन भी है और नहीं भी. नयनो से मेरे अश्रु अपने आप बहने लगते है , शायद अपने अभाग पर और अपनी सखी के भाग पर भी.


हाथ जोड़ कर चुपचाप दबे पांव मैं कमरे से चल पड़ती हूँ बाहर। उधर मीरा अपना सच धीमे धीमे सुर में गाये जा रही है 


"मारे जनम रा साथी थाने । ..."

 



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