अनमोल
अनमोल
"मदद करने के लिए केवल धन की जरूरत नहीं होती, उस के लिए एक अच्छे मन की जरूरत होती है"
बहुत प्रयत्नों के बाद मुझे एक होटल में महा प्रबंधक के निजी सचिव के पद पर नौकरी मिली। वेतन ज्यादा नहीं था पर कुछ ऊपरी आमदनी से खास कमाई हो जाती थी। मेरी शुरू से एक आदत रही है कि रोज किसी एक जरूरतमंद को कुछ दे सकूं, भले ही वह राशि दस रुपये ही क्यों न हो।
नौकरी मिलने के बाद हाथ कुछ खुल गए और कभी किसी को नाश्ता करवा देता, तो कभी भोजन करवा देता, ऐसा करने से मुझे सुकून मिलता था।
एक दिन मुझे अपने काम से वापस आने में काफी देरी हो गई, बरसात का मौसम, रात के दस बज रहे थे, अचानक कार रुक गई, सड़क पर चारों ओर पानी भरा था, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं "किंकर्तव्यविमूढ़" सा खड़ा था। उतने में एक व्यक्ति साइकिल से आता हुआ दिखा, वह व्यक्ति पास आ कर रुका और पूछा :
"क्या हुआ सर"?
"कार रुक गई है, पास में कोई मैकेनिक भी नहीं दिख रहा है"
"सर, मैं कोई बड़ा मैकेनिक तो नहीं हूं पर अगर आप अनुमति दें तो एक बार मैं कोशिश करता हूं"
"ठीक है ट्राई करो"
वह बोनेट खोल कर चेक किया और किसी वायर को टाइट किया फिर गाड़ी स्टार्ट करने को कहा, स्टार्ट किया तो गाड़ी चालू हो गई।
मैंने उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया और कुछ पैसे देने की कोशिश की, तो उसने लेने से मना कर दिया, बहुत जोर देने पर बोला
"सर, मैं सिर्फ आपकी मदद की है, पैसे के लिए कुछ नहीं किया"
"ठीक है, तुम अपना नाम तो बताओ,
"घनश्याम सर"
मैं पुनः उसे धन्यवाद दे कर वहां से निकल गया।
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मेरे बॉस एक बुद्ध जीवी थे, आईआईएम से पढ़े लिखे हैं, उनके पास होटल मैनेजमैंट, प्रशासन और मार्केटिंग का कार्यभार था। वह स्वभाव से बहुत ही ईमानदार और अनुशासित प्रवृति के थे। उन्हें ये पसंद नहीं था कि कोई हाथ फैलाये, अगर ऐसा कोई करता तो उसे झिड़क देते थे। पर जब भी कोई प्राकृतिक आपदा हो तो मुख्यमंत्री राहत कोष और प्रधानमंत्री राहत कोष में एक बड़ी रकम दान करते थे।
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एक रात जब मैं वापस आ रहा था तो रास्ते में एक व्यक्ति घायल पड़ा था, पास में उसकी पत्नी रोते हुए लोगों से मदद मांग रही थी पर कोई उसकी मदद हेतु रुक नहीं रहा था।
मैने गाड़ी रोकी और उस घायल व्यक्ति को गाड़ी में बिठा कर पास के अस्पताल ले गया, एडमिट किया और कुछ पैसे दे कर निकलने लगा, तभी देखा कि घनश्याम अस्पताल के रिसेप्शन पर विनती कर रहा था
मैडम, मेरा बच्चा बीमार है, अस्पताल में भर्ती कर लीजिए, जितने पैसे लगेंगे कल ला कर जमा कर दूंगा, पर रिसेपनिस्ट नियमों का हवाला दे कर भर्ती करने से मना कर रही थी, "बिना एडवांस जमा किए भर्ती नहीं ले सकते"
मैं पास गया और पूछा,
"क्या हुआ घनश्याम?"
वह तुरंत मेरे पैरों पर गिर गया और कहने लगा
"सर मेरे बच्चे को बचा लीजिए"
मैने कहा - "ठीक है, मैं देखता हूँ"
कितना जमा करना है, मैने रिसेपनिस्ट से पूछा
"दस हजार सर", वह बोली
मैं तुरंत दस हजार जमा किए और घनश्याम के बच्चे को भर्ती कराया।
वह कृतज्ञता भरे भाव से हाथ जोड़कर धन्यवाद देने लगा, कहने लगा
"सर, आपका पैसा बहुत जल्द आपको वापस कर दूंगा"
"घनश्याम, पहले बच्चे का ध्यान रख, पैसे की चिंता मत कर, ये कोई उधार नहीं है"
उसने मेरा नम्बर लिया और अपना नंबर दिया।
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एक दिन की बात है, होटल में पार्टी थी और पार्टी के बाद कुछ बिरयानी पैकेट बच गए थे, चीफ सैफ आया और कहा
"सर, बचे हुए बिरयानी पैकेट क्या करना है"
"आपस में बाँट लो"
मैने कहा
चीफ सैफ वापस जाने को मुड़ा, मैंने उसे रोका और बोला
"एक काम करना, तीन चार पैकेट मेरी गाड़ी में रखवा दो, रास्ते में एक जरूरतमंद है उसे दे दूंगा"
"ठीक है सर"
फिर मैने घनश्याम को फोन लगाया और पूछा
"कहां हो"
"घर पर सर"
"खाना हो गया"
"नहीं सर, बनाने की तैयारी चल रही है"
रात के नौ बजे थे, खाने की तैयारी, मेरी समझ में आ गया कि या तो घर पर खाने को नहीं है या अभी राशन घर आया है, मैने तुरंत कहा
"खाना मत बनाओ, मुझसे संगम चौक पर मिलना"
"पर सर......?"
"तुम वहां मिलो", इतना कह कर मैंने फोन काट दिया।
वापसी में संगम चौक पर घनश्याम खड़ा मिला, मैने गाड़ी से निकाल कर बिरयानी पैकेट उसे दिये, और बताया कि होटल में पार्टी था, वहीं से लाया हूं। मैं जनता था घनश्याम एक स्वाभिमानी व्यक्ति है और बिना मजबूरी के किसी से कोई मदद स्वीकार नहीं करता।
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एक दिन होटल आ रहा था, देखा गेट पर गार्ड किसी महिला से बात कर रहा था और उस महिला के आँखों से आंसू बह रहे थे, मैं रुका, पूछा क्या हुआ, ये कौन है, उस महिला की तरफ इशारा किया
"सर, ये मेरी पत्नी है, बच्चा बीमार है, पैसे लेने आई है"
"तो दे दो"
"अभी पैसे नहीं है सर"
"ठीक है एक काम कर ये दो हजार रुपए रखो और पहले बच्चे का इलाज़ कराओ"
"नहीं सर, मैं कोई इंतजाम कर लूंगा"
"पहले ये पैसे रख", मैंने जबरदस्ती गार्ड के हाथ में पैसे थमाए।
उसी वक्त मेरे बॉस की गाड़ी गेट से गुजरी, उन्होंने एक नजर मेरी तरफ देखा, और आगे बढ़ गए।
जैसे ही अपने ऑफिस पहुंचा, बॉस ने अपने केबिन में बुलाया और पूछा
"क्या हो रहा था गेट पर"
मैंने पूरी घटना उनको बताई
"मिस्टर नीरज, वो भी कमा रहा है, ऐसे मदद करने की क्या जरूरत है, बेवजह उसकी मांगने की आदत पड़ जाएगी"
"नहीं सर, बुरे वक्त में पीड़ितों के साथ खड़े होने पर जो खुशी मिलती है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते। सर आप भी जब भी कोई प्राकृतिक विपदा आती है तो राहत कोष में एक बड़ी रकम दान करते हैं न, उससे आपको खुशी मिलती भी होगी। सर, एक बार किसी पीड़ित को उसकी मजबूरी में मदद करके देखिए उस वक्त जो खुशी आपको मिलेगी वो अद्भुत होगी"
सरकारें भी राहत कोष से पैसा लोगों की मदद में ही खर्च करती है पर जो खुशी प्रत्यक्ष मदद में मिलती है वो आपको राहत कोष में दान से नहीं मिलेगी। जब किसी की मदद करते हैं तो अगले की आँखों में जो संतुष्टि दिखती है और कभी कभी यही संतुष्टि उसकी आँखों से बहने लगती है, उस वक्त आपको महसूस होगा कि आपने जीवन में एक सर्वश्रेष्ठ कार्य किया है"
"शायद आप ठीक कह रहे हो नीरज, ठीक है उस गार्ड को बुलाओ"
मैंने उस गार्ड को बुलाया
बॉस ने उसे पांच हजार रुपए दिये और उससे कहा, तुम तुरंत अपने घर जाओ और बच्चे का ध्यान रखो।
मुझे छोटे छोटे मदद से बहुत खुशी मिलती थी पर आज जो हुआ उसके बाद जो खुशी, अनुभूति मिली उस खुशी को शब्दों में बांध नहीं सकते, वो असीमित है, अनमोल है।
सूर्याराव बोमिडी
विशाखापत्तनम
13 फरवरी 2026
