अनकही यादे (प्रथम खंड)
अनकही यादे (प्रथम खंड)
पहाड़ियों से घिरा एक छोटा सा गांव, जहाँ प्रकृति की सुंदरता अपने चरम पर थी। हर सुबह सूरज की पहली किरणें हरे-भरे पेड़ों के बीच से झाँकतीं और गांव के प्रत्येक कोने को सोने जैसी आभा से भर देतीं। यह दृश्य इतना मोहक था कि हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता।
बहुत समय बाद राहुल अपने गांव माणा आया था। उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा पर बसा यह आखिरी गांव किसी स्वप्नलोक से कम नहीं है। भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनाथ से थोड़ी दूरी पर 3219 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माणा गांव किसी की कल्पना जितना ही सुंदर है। हरे रंग में सजे और बर्फ से ढके शक्तिशाली हिमालय से घिरा, उत्तराखंड का यह आखिरी गांव सरस्वती नदी के तट पर बसा है।
राहुल को बचपन की वो यादें ताज़ा हो गईं जब वह अपने परिवार के साथ इस गांव की सुंदरता का आनंद लिया करता था। पांडव, जो स्वर्गारोहिणी तक पहुँचने के दौरान इस गंतव्य को पार कर गए थे, माणा की सुंदरता से जरूर मोहित हो गए होंगे। यहां पर छोटे-छोटे सजाए गए नक्काशीदार कॉटेज हैं जिन्हें स्थानीय लोग आलू और राजमा की खेती करते हुए अपना घर कहते हैं। यह गांव भेड़ के ऊन से बने उत्पादों जैसे शॉल, टोपी, मफलर आदि के लिए भी जाना जाता है।
गांव के बुजुर्गों ने राहुल का स्वागत किया और उसे गांव की नई-पुरानी कहानियाँ सुनाने लगे। राहुल ने देखा कि गांव में बदलाव हुए थे, लेकिन उसकी आत्मा वही थी - शांत, सुंदर और दिव्य। गांव की सड़कों पर चलते हुए, उसने स्थानीय दुकानों को देखा जो हाथ से बने ऊनी वस्त्रों से सजी थीं। हर दुकान पर कारीगर अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे थे और उनके चेहरे पर मेहनत की चमक थी।
सरस्वती नदी के पास जाकर राहुल ने पानी में अपनी परछाई देखी। नदी का शीतल जल उसके चेहरे को छूता हुआ मानो उसे अपने गांव की गोद में वापस लाने की कोशिश कर रहा था। गांव के चारों ओर फैले हरे-भरे खेत, जिनमें आलू और राजमा की खेती होती थी, उसकी नज़रों को सुकून देते थे।
माणा गांव के लोग बहुत ही सरल और मेहनती थे। वे अपनी परंपराओं को बहुत संजीदगी से निभाते थे। गांव में हर साल कई त्योहार मनाए जाते थे, जिनमें सभी लोग मिलकर भाग लेते थे। राहुल ने देखा कि गांव के बच्चों की आँखों में भी वही मासूमियत और उत्साह था जो उसने अपने बचपन में देखा था।
राहुल ने गांव के छोटे से स्कूल में जाकर बच्चों से मुलाकात की। वहां के शिक्षक उसे जानते थे और उन्होंने उसे बच्चों के सामने अपने अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित किया। राहुल ने बच्चों को अपने जीवन की कठिनाइयों और उपलब्धियों के बारे में बताया और उन्हें प्रेरित किया कि वे भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करें।
उस शाम, गांव में एक विशेष उत्सव का आयोजन किया गया। हर घर से लोग निकले और गांव के मुख्य चौक पर जमा हुए। वहाँ एक बड़ा पंडाल सजाया गया था और चारों ओर रंग-बिरंगी लाइटें चमक रही थीं। संगीत और नृत्य का माहौल था। राहुल ने महसूस किया कि भले ही वह वर्षों बाद अपने गांव लौटा था, लेकिन उसकी जड़ें अभी भी यहीं थीं।
राहुल का बचपन माणा गांव में बीता था। वह इसी गांव में पैदा हुआ था और यहीं की मिट्टी में खेलकर बड़ा हुआ था। उसके जीवन के शुरुआती साल हरे-भरे खेतों और पर्वतों के बीच गुजरे थे। माणा गांव का स्कूल ही उसकी शिक्षा का पहला केंद्र बना। उसने इण्टर तक की परीक्षा उसी स्कूल से उत्तीर्ण की थी। गांव का स्कूल छोटे लेकिन प्रभावी शिक्षकों से भरा हुआ था, जो बच्चों को न केवल किताबों की बल्कि जीवन की भी शिक्षा देते थे।

