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Ira Johri

Abstract


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Ira Johri

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अभिशप्त कलम

अभिशप्त कलम

3 mins 160 3 mins 160

सुबह के शान्त वातावरण में ज्यों ही विचारों का कुलबुलाना शुरू होता।नजर सामने दूर तक फैले सन्नाटे में भी होने वाली गतिविधियों को भेदना शुरू कर देती। ऊपर फैला हुआ नील गगन और उसमें मस्ती से उन्मुक्त उड़ान भरते हुये पक्षी व नीचे फैले अथाह जल में तैरते हुए "सोना-चाँदी "।हाँ यही नाम दिया है हमनें उन बद्दखों को। जब भी उस जोड़े को देखती हूँ साथ में किलोल करते हुये ही नजर आते है। ऐसे सुखद दृश्यों को देख मन को बहुत सुकून मिलता है। मन पाखी अभी विचरण कर ही रहा था कि तभी उसका ख्याल दिमाग़ पर हावी होने लगा। जब से उसके बारे में जाना था कि उसका भंवरा पति उसे एक फूल की सौगात दे कर अब किसी और की बगिया महका कर वहाँ भी फूल खिला रहा हैऔर यहाँ वह समाज के सामने दिखावा करके झूठ की चादर ओढ़ "एक दिन मेरा माज़ी मेरे पास वापस लौट आयेगा "इस भुलावे में जीते हुये सास ससुर की सेवा करते हुये दिन बिता रही थी। अति तो तब हो गयी जब उसके पराग कण को उज्ज्वल भविष्य की कामना भविष्य की दुहाई दे उससे दूर कर दिया गया।

हृदयतल की गहराई से हर दुःख को महसूस करने की आदत के कारण उसकी पीड़ा के बारे में सोच मन छटपटाहट से भर गया। स्थिति वो हो गयी कि दिल में बहुत कुछ करने की चाहत होते हुये भी कुछ कर नहीं सकती थी।सामाजिकता की बेड़ियों से हाथ पाँव बंधे हुये थे कि किसी के घरेलू मामलों में तब तक दखल नहीं देना चाहिए जब तक पानी सिर से ऊपर न हो जाये।

फिर सोंचा क्यों न अपनी लेखनी की तलवार चला कर उसको बेड़ियों से मुक्त कराने की राह सुझाते हुऐ नई राह दिखाई जाये। आखिर यह कलम ही तो है जो किसी के अधिकार क्षेत्र में भी अनाधिकार प्रवेश कर बेधड़क हो अकेले चल सकती है। किसी के मन विचारों पर तो किसी का पहरा होता नहीं। रेत के पुल वही बनाते हैं जिन्हें उन राहों पर चलना नही होता। किसी संकट में फंसे व्यक्ति को निकालने के लिए विचारों के सागर में डूबते उतराते इतना खो गयी कि समय का भान ही न रहा। तभी मोबाइल की सुमधुर आवाज नें तन्द्रा भंग की।उधर से मुहल्ले के खबरी की अपना पेट दर्द हल्का करने हेतु हमें देने के लिये उसके हिसाब से चटपटी खबर थी कि " चिड़िया उड़ गयी भाभी जी।" मैं दंग रह गयी कि अभी तो हमारी कलम नें यह अन्त लिखा ही था और वहाँ उसका क्रियान्वयन भी हो गया। सच तो यही है कि जिसके ऊपर बीतती है छटपटाहट भी उसी को ज्यादा होती है। अपनी कलम मुझे अभिशप्त सी लगने लगी। कभी मैं अपनी अभिशप्त कलम को तो कभी उसकी जिन्दगी के सूनेपन को कल्पना में देखने लगी। 


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