अब तू पियामिलन के ख्वाब सजा
अब तू पियामिलन के ख्वाब सजा
माँ तुलसी चौरा पर आरती कर ही रही थी कि तभी...
अंतरा की ख़ुशी से चहकती आवाज़ गूंज उठी,"माँ ! जल्दी से बाहर आओ, दिदू आ गई !"सुबह से बाट जोहती अंतरा घर के सामने गाड़ी रुकते देखकर जोर से चिल्लाई तो माँ जल्दी जल्दी लोटे में पानी भरकर दरवाज़े पर ख़डी हो गई।जैसे ही आकांक्षा गाड़ी से उतरी अंतरा जोर से अपनी दिदू के गले लग गई। फिर उनकी गोद से अंशु को लेकर उसे जोर से अपने से लिपटा लिया।नन्हाँ अंशु भी अपनी मासी से यूँ चिपक गया जैसे वर्षों से बिछड़ा हो। यह दृश्य देखकर माँ की आँखें ख़ुशी से चमक उठी। बचपन से इन दोनों बहनों का प्यार ही तो उनकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा संतोष था।आकांक्षा जब माँ के चरण स्पर्श करने झुकी तो माँ ने उसे रोकते हुए लाड़ से कहा,"रुक जा पगली! पहले तेरे पैर धोने की रस्म तो कर लूँ। बचपना गया नहीं तेरा अब तक !"
माँ ने लाड़ से डांटा तो आकांक्षा बोली,
" ओहो... मेरी भोली माँ ! अब सैण्डल के नीचे कहाँ पानी पहुँचता है, पर आप यह रस्म किये बगैर तो अंदर जाने दोगी नहीं !"
हँसते हुए आकांक्षा ने कहा तो माँ ने उसे प्यार से गले लगा लिया।
तीन महीने पहले ही तो मायके आकर गई थी आकांक्षा।. पर माँ का प्यार तो ऐसा है कि एक दिन को भी बच्चा आँखों से दूर चला जाए तो माँ की आँखें उसे देखने को विकल हो उठती हैँ।आकांक्षा को भी माँ ऐसे प्यार कर रही थी जैसे वर्षों बाद मिली हो।गिरधर जी और सुधा जी की दो बेटियाँ ही थी,बड़ी आकांक्षा और छोटी अंतरा।
भिवाड़ी के इस रिहायशी इलाके के निर्वाण ब्लॉक में जितने भी परिवार थे सबमें लगभग इनका आना जाना था।
वजह था दोनों बहनों का मिलनसार स्वभाव। दोनों वर्षों पढ़ाई के लिए बाहर रहीं पर जब भी छुट्टियों में आतीं पड़ोसियों से मिलने ज़रूर जातीं और उनके साथ अच्छे संबंध बनाए रखती थीं।
लिहाज़ा पड़ोसी भी उनकी बड़ी मदद करते रहे। इसलिए अब बैंक की नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद भी गिरधर जी और सुधाजी वृद्धावस्था में यह ज़गह छोड़कर अपने पैतृक गाँव जाने को राज़ी नहीं थे।बहरहाल...इसबार आकांक्षा बहुत खुश थी,
क्योंकि अंतरा की शादी तय हो गई थी।लड़का अच्छा भला था और अंतरा को पसंद भी था।इसलिए तो सबकी ख़ुशी दुगुनी हो गई थी।अबके तो रक्षाबंधन के तीन दिन पहले आकर आकांक्षा ने अंतरा को एकदम खुश कर दिया था। दोनों ने एकदूसरे के साथ खूब वक़्त बिताया, दोनों बहनों ने बातें की। वैसे भी इन दोनों बहनों की बातें तो कभी ख़त्म ही नहीं होती थी। आकांक्षा के पति बैंक में अफसर थे और ऐन राखी के दिन पहुँचने वाले थे।अंशु तो नाना नानी की आँखों का तारा था।रक्षाबंधन के दिन सुबह से ही घर में चहल पहल थी। घर के दामाद अंकुर भी आ चुके थे।अंतरा उन्हें भी राखी बाँधती थी।वैसे बचपन से दोनों बहनें एक दूसरे को राखी बाँधती आई थी। इसबार अंतरा की शादी तय हो गई थी इसलिए आकांक्षा जब तब उसे छेड़ देती और वह शरमा जाती थी।पर....
आकांक्षा ने गौर किया कि शादी की बात आने पर एक तरफ जहाँ अंतरा खुश होती वहीँ दूसरी तरफ उसकी आँखें भी भर आती थी।
आज भी एक दूसरे को राखी बाँधने के बाद जब आकांक्षा ने अंतरा को छेड़ा कि,"इस साल तो यहाँ इस घर में बाँध रही है राखी।
अगले साल तो तेरे ससुराल जाना पड़ेगा!"
इतना सुनते ही अंतरा ज़ोर से रो पड़ी। उसके यूँ अचानक रोने का कारण किसीको समझ नहीं आया।थोड़ी देर में अंतरा जब संयत हुई तो आकांक्षा ने उसे अकेले में यूँ रोने का कारण पुछा तो सिसकते हुए अंतरा ने अपने मन की बात बताई कि...उसे हमेशा यह चिंता खाये जा रही है कि शादी के बाद जब वह मुंबई चली जाएगी तो माँ और पापाजी तो बिल्कुल अकेले पड़ जायेंगे। उनकी देखभाल कौन करेगा? अब उनकी उम्र हो चली है, ऐसे में उन्हें यूँ अकेले एक दूसरे के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं।
"बस इतनी सी बात ?रुक मैं तुझे एक चीज दिखाती हूँ छोटी।तुने ये कैसे सोच लिया कि मैं माँ पापाजी को अकेले रहने दूँगी। बचपन से सारी ज़िम्मेदारी बाँटते आए हैँ। अबतक तुने की अब आगे माँ पापाजी की देखभाल मेरे ज़िम्मे छोड़कर तु तो बस अब अपने पियामिलन के सपने सज़ा !"
अब मैं आ गई हूँ रे छोटी... अब तू ख्वाब सजा...!
फिर आकांक्षा अपने बैग से एक पेपर लाई जो उसका ट्रांसफर लेटर था। संजोग से दोनों पति पत्नी एक ही बैंक में नौकरी करते थे। बहुत कह सुनकर दोनों ने अपना तबादला करवाया था।
बस...सात दिन बाद जोइनिंग थी। आकांक्षा ने यह बात बतौर राखी के गिफ्ट के तौर पर छुपा रखी थी।
यह देखकर अंतरा अपनी दिदू के गले लग गई।वह कैसे भूल गई कि.....यह तो उसकी वही दिदू है जो बचपन से लेकर हमेशा उसके साथ सारी ज़िम्मेदारी बाँट लिया करती थी। आकांक्षा और अंतरा अक्सर यह फेवरेट गाना गाती थीं...
"फूलों का तारों का सबका कहना हैएक हज़ारों में मेरी बहना है"
आज आकांक्षा ने उसमें यह पंक्तियाँ जोड़ दी फिर गाना समाप्त होते ही आकांक्षा गा उठी..."मैं ही तेरी बहन हूँ बहना हूँ,
और मैं ही हूँ तेरा भाई !
अम्मा बाबुजी से जा कह दे ,
एक गई तो अब दूजी आई !"दोनों बहनें गलबंहियाँ डालकर यही गाना गा रहीं थीं.
उन्हें देखकर माँ पापाजी और अंकुर बहुत खुश थे। और अपनी नानी की गोद में बैठा अंशुल ख़ुशी से ताली बजा रहा था।अंतरा को इसबार रक्षाबंधन पर उसकी आकांक्षा दिदू ने बेहद प्यारा गिफ्ट दिया था... सुकून भरा और प्यार भरा
हर ज़िम्मेदारी बाँटती बहनें माता पिता के बुढ़ापे का सहारा तो थीं ही एक दूसरे का भी संबल बनी थीं।
प्रिय दोस्तों
रक्षाबंधन सिर्फ एक धागा बाँधने की रस्म नहीं है बल्कि अपने भाई बहन के हर दुख सुख में साथ देने का वचन भी है। कैसी लगी आपको दो बहनों की ज़िम्मेदारी बाँटनेवाली राखी?
कृपया अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें।

