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V. Aaradhyaa

Abstract Drama

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V. Aaradhyaa

Abstract Drama

आप जैसा कहें मैं वैसा करुँगी

आप जैसा कहें मैं वैसा करुँगी

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"बस ... बहू ! रात बहुत हो चुकी है । अब तुम जाओ सो जाओ। जो काम बच रहा है वह हम सब सुबह मिलकर कर लेंगे ! "


वसुधा को यकीन नहीं आ रहा था।

कि ...

कल तक सिर्फ हुक्म चलाने वाली और दहाड़ने वाली सास आज उससे इतने प्यार से कैसे बात कर रही है।


यह हुक्म तो उसकी सास का ही था कि रात में सारा चौका बर्तन साफ करके सोना है।सुबह बासी रसोई में काम नहीं किया जाता और बर्तनों से जो बदबू आती है वह सास को बिल्कुल पसंद नहीं है।


" बहू! मेरी एक बात ध्यान से सुनो। और सब बातें तो फिर भी मैं एडजस्ट कर लूंगी लेकिन रसोई मुझे बिलकुल साफ-सुथरी चाहिए। रात में सोने से पहले चौका बर्तन बिल्कुल साफ करके सोना। महरी सुबह आती है लेकिन वह सुबह आठ बजे के बाद आती है उसके पहले घर के लोग चाय पी चुके होते हैं और तुम्हारे बाबू जी दुकान पर काम के लिए निकलने की तैयारी कर रहे होते हैं। उन्हें सुबह नाश्ता करके जाना होता है, इसलिए उसके पहले रसोई साफ होनी चाहिए। इतना सारा काम सुबह सुबह नहीं हो पाएगा, इसलिए चौका बर्तन रात में करके सोना ही सही रहेगा। पूरी जिंदगी मैंने रात में सोने से पहले रसोई साफ की है, तो तुम भी रसोई साफ करके और बर्तन होकर सोना बाकी बचे बर्तन महरी आकर धो देगी। लेकिन सुबह नाश्ते तक काम कर आने वाले बर्तन तुम धोकर सोओगी!"


सास ने उसके लिए लगभग एक फरमान ही जारी कर दिया कि वह रात में सोने से पहले पूरी रसोई साफ सुथरी करके बर्तन धोकर सोए, जो क्रम अब तक जारी था।


इधर मुन्ना के होने के बाद से वसुधा को बहुत परेशानी होती थी। क्योंकि अभी मुन्ना आठ महीने का था और सारा काम करते-करते वह बीच में जाग जाता तो उसे हाथ का काम छोड़ कर उसे देख कर आना पड़ता था। इससे उसे काम करने में रात में और देर हो जाती थी।

जब अमित कहता कि,

"और क्या मजाल जो तुम्हारे बाबू जी कभी रसोई में झांककर भी गए हों। तुमने कभी देखा है...?

तेरे बाबूजी को मेरे साथ रसोई में काम करते हुए या मेरी मदद करते हुए। या उन्होंने रसोई में कभी पानी भी उबाला है ? तू जा आराम कर और मुन्ना को मेरे पास दे दे। यूँ रसोई में घुसे रहना और बीवी के पीछे लगे रहना रहना मर्दों का काम नहीं है!"


आज पता नहीं क्यों मुन्ना भी कुछ ज़्यादा ही रो रहा था रात काफी ठंडी थी। बाहर कोहरा भी था दिसंबर की ठंडी रात कोई कड़ाके की ठंड ऐसे में ठंडे पानी से बर्तन धोना एक तरह से पनिशमेंट ही तो हुआ।

तभी ना जाने वसुधा के ससुर अशोक जी को क्या हुआ...?

वह उठकर आए और अपनी बेटी स्नेहा से भी कहा कि,

" स्नेहा! उठो बेटा! जाओ ज़रा अपनी भाभी की मदद कर दो। तुम दोनों मिलकर काम करोगे तो काम जल्दी खत्म हो जायेगा!"


जब स्नेहा उठकर आई और वह वसुधा की मदद करने लगी तब आराधना जी ने फिर से कहा,


" उसने स्नेहा से कहा,

"बस... स्नेहा जीजी ! थोड़े से ही बर्तन हैं। बाकी पूरी रसोई की सफाई हो चुकी है। मैं बर्तन धोकर सो जाऊँगी। आप चलकर सो जाइये!"

"मैं तो सो ही जाऊंगी भाभी! मैं तो आपको सोने का कह रही थी। अभी मुन्ना छोटा है, कहीं उसे ठंड लग गई तो वह बीमार पड़ जायेगा!"


पर... वसुधा अपनी धुन में काम किये जा रही थी। एक तो उसे सफाई का बड़ा मेनिया सा था। ऊपर से परफेक्ट बहू बनने की जो अदम्य लालसा थी। वही उससे इतना काम करने को उकसाती थी। और सास को शिकायत का मौका नहीं देना चाहती थी।


आख़िरकार वसुधा जब पूरा रसोई की सफाई और बर्तन धोकर फारिग होकर कमरे में आई...

तब तक मुन्ना थककर सो चुका था और अमित भी लगभग सोने सोने पर था।


उसने वसुधा से कहा,

"अब से तुम बर्तन सुबह धोना।"

आगे से याद रखना कि....

 यह बर्तन रात की बजाय सुबह भी धोए जा सकते हैं!"

आगे से तुम सारे बर्तन रात में नहीं धोओगी!"


पता नहीं पति के प्रेम में कैसा आग्रह था...?


कैसा गहरा अपनापन.....?


कि वसुधा अमित का हाथ थामकर उसे अपने गाल से लगाकर देर तक रोती रही और भरी भरी आंखों से अमित को देखकर सिर्फ इतना ही कहा कि,

अगली सुबह उससे उठा ही नहीं जा रहा था। उसका

शरीर बुखार से बुरी तरह तप सा रहा था। और सिर में दर्द अलग से हो रहा था।

अमित उसके लिए चाय लेकर आया तो उसे बड़ा बुरा लगा कि उसके होते हुए उसके पति को काम करना पड़ रहा है।

मुन्ना भी बगल में नहीं था। उसे शायद स्नेहा उसकी दादी के पास ले गई थी। और शायद स्नेहा रसोई में नाश्ता बना रही थी।


"अरे...! स्नेहा को तो कॉलेज जाना होगा। लगता है उसे आज कॉलेज जाने में लेट हो जाएगा!"

वसुधा बोली तो अमित बोला,

" हां... स्नेहा तुम्हारे लिए गरमा गरम मगर टोस्ट बनाकर ला रही है। अब तुम जल्दी से उठ जाओ ब्रश कर लो, ताकि नाश्ता कर सको। तुम्हें ठंड में थोड़ी सी हरारत हो गई है। मैं तुम्हें परासीटामोल दे करके फिर ऑफिस के लिए तैयार होऊंगा!"


वसुधा हड़बड़ाकर ब्रश करके जब रसोई में पहुंची तब तक स्नेहा उसके लिए नाश्ता ले कर आ ही रही थी। उसे देखकर स्नेहा बोल उठी,

"अरे....भाभी! आप क्यों उठकर आ रही है? मैं आपके लिए नाश्ता ला ही रही थी!"

"अब मैं सब संभाल लुंगी स्नेहा जीजी! आप कॉलेज़ जाने की तैयारी करो!"

तब तक उसके सास भी मुन्ने को लेकर आ गई थी। और वसुधा से बोली,

"बहू! अब से तुम्हें रात में बर्तन धोकर सोने की कोई जरूरत नहीं है चौका बर्तन सुबह भी हो सकता है।

उन तीनों की वजह से वसुधा की बहुत बड़ी समस्या का समाधान तो हो ही चुका था। इसलिए वह यूं ही मुस्कुरा कर बोली,


" ठीक है अम्मा जी ! आप जैसा कहती हैं,

मैं वैसा ही करूंगी "

कहकर वसुधा ने मुन्ने को गोद में ले लिया और पूरा परिवार हल्के-फुल्के माहौल में स्नेहा के बनाए हुए टोस्ट और चाय का मजा लेने लगा।


(समाप्त )



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