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Anju Kanwar

Tragedy


4.8  

Anju Kanwar

Tragedy


आजादी

आजादी

5 mins 288 5 mins 288


अजब सी पहेली में फंसी हूं चारों तरफ अंधकार में ढली हूं फुर्सत नहीं पलक झपकाने की सो चू बिना जब झपकाए जिंदगी गुजार लूं ....

बोझिल सी हो गई जिंदगी बांधे कर्ज की गठरी मैं पड़ी हूं ,, झरना आंखों का सूख गया मेरा धसी आखे गालों में बस गई हो जैसे।।

हो गई बेजान शी में कैसे,, कहती थी भंवरों की तरह जिस्म से जैसे रूह उतर गई हो मिट्टी में ढल गई हूं मैं,,

याद आया मुझे वह दिन सपनों में चाहकती थी मैं, कुछ बनने को उड़ा करती थी दुपट्टे से पंख बनाकर खुद को हवा देती थी,,

मेरी आवाज से जो घर महकता था आज ना बोलने से उदास हो गया,, मैं क्या बोल नहीं सकती??

परंतु जुबान लड़खड़ा ने लगी है शब्दों की परिभाषा भूल गई हूं दिल में शब्दों का भंडार पड़ा है पर जुबान पर आने पर कहीं लुप्त हो जाता है,,,। क्या हो गया था मुझे चिकने वाली लड़की एक दिन में बेजान मूर्ति बन गई थी रोना चाहती हूं पर कतरा नहीं आता आशु का,,। वक्त की पाबंदी थी मैं हमेशा की तरह रोजमर्रा का कार्य कर बस स्टैंड गई जैसे बस रुकी झट से मैंने सीट पकड़ी खिड़की वाली सीट पर बैठ गई जब-जब हवाएं मेरे चेहरे से छूती और जुल्फें उड़ती एहसास होता कुछ सपने पूरा करने का माता-पिता का नाम रोशन करने का सोचते सोचते न जाने कब आंख लग जाती थी सीटी बजी आंखें खुली कोचिंग सेंटर आ गया था शायद मैं उतर गई कक्षाएं न जाने आज क्यों अतिरिक्त लग गई घर जाने में देरी हो रही थी,, मैं तोहफा देना चाहती थी मेरे पापा को सब कह कर बोले उनको कलेक्टर साहिबा के पापा,, क्लास खत्म होने के बाद स्टैंड पर गई काफी देर हो गई आज बस नहीं आई थोड़ी आगे चली मुझे किसी गाड़ी का हॉर्न सुना पीछे मुड़कर देखा तो गाड़ी मेरे बगल में रुकी..

गाड़ी का शीशा धीरे-धीरे नीचे हुआ वैसे ही आवाज आई "मैडम कहां जा रहे हो" मैंने शीघ्रता से गाड़ी की तरफ देखा ड्राइवर वाली सीट पर देखा तो जाना पहचाना शख्स था आवाज "आई भूल गई हो क्या मैडम??"

मैंने गौर से उसकी तरफ देखा तो याद आया कॉलेज में सहपाठी था कॉलेज खत्म होने के बाद कभी दिखा नहीं मैंने कहा बस नहीं आई तो घर जा रही हूं तभी शीघ्रता से उत्तर आया "मैडम मैं छोड़ देता हूं तुम्हें घर तुम परेशान ना हो एक बार लगा कि नहीं विश्वास ना करो फिर लगा जानती हूं और घर जाने के लिए भी देरी हो रही है मैंने देर ने लगाई बैठने में जैसे ही गाड़ी चली मैंने पिछली सीट पर मुड़कर देखा दो शख्स और बैठे थे मैंने पूछा यह कौन है बोले यह मित्र हैं मेरे किसी किसी कार्य के लिए आए थे मैं सहज और सुकून के साथ बैठ गई खिड़की की हवा में न जाने कब आंखें लग गई आंखें खुली तो पाया मैं कहीं सुनसान जगह थी यह जगह मैंने कभी ना देखी थी जैसे उठने लगी तो पाया मेरे हाथ पैर बंधे हुए मुंह में कपड़ा था मैं अंदर ही अंदर चिल्ला रही थी पर आवाज बाहर ना निकले,,, 

तीनों लड़के मेरे सामने आए उनके हाथों में शराब की बोतले थी मेरी आंखें बंद हो गई थी खुली तो मैंने अस्पताल में खुद को पाया चारों तरफ देखा तो मां पिताजी बैठे थे देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए पिताजी ने सर पर हाथ घुमाते बोला बेटा तुम्हें 16 दिन बाद होश आया है क्या हुआ था तुम्हारे साथ कौन थे वह तुम ठीक हो ना ना जाने देखते देखते सवालों की बौछार लग गई मेरे सामने धुंधला धुंधला सा याद आया वह दिन जब मैं खून से लथपथ पड़ी रही तीनों शख्स ने मेरे जिस्म और रूह को रौंद दिया,,। 

दरिंदगी सोचते ही मुंह से चीख निकल गई कुछ दिन बाद अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया पुलिस में रिपोर्ट नहीं की कहते भी क्या मां पिताजी रिपोर्ट करके,, मुझे घर ले जाया गया 8 आस-पड़ोस में लोग मुझे देख रहे थे न जाने मेरा क्या कसूर था कसूर था क्योंकि मेरा बलात्कार हुआ था समाज भी अजीब है ना पुरुष चाहे वैश्या से अपनी मर्दानगी साबित करें या निर्दोष मासूम लड़की को रोंदे अपनी चुप्पी साधता है।। क्योंकि मानसिकता में तो पुरुष प्रधान ही समाज रहा है घर में आने के बाद मैं केवल नाम मात्र के इंसान रहे बाकी इंसानियत सपने विश्वास सब खत्म हो चुका था मेरा।।।।

समय बीतता रहता हालत में कोई सुधार न आता ना उठा जाता ना कहीं मन लगता शायद मैं बोझ बन गई थी,,

एक केवल मात्र कागज था जिस पर मैं अपनी व्यथा उतार रही थी आज न जाने क्यों लिखते लिखते आंखों से आंसू उतर गए क्या गलती थी मेरी जो इस गलती की सजा मिली मुझे..

विश्वास टूट गया सपना छूट गया मेरा शरीर रौंद दिया गया मेरा,,

क्या गलती थी मेरी जो मैंने जाने पहचाने पर विश्वास किया न जाने समाज में कितनी लड़कियों के साथ ऐसा होता होगा जिनके सपने टूटते होंगे बेजान मूर्ति बनती होंगी लड़कियां शायद चुप्पी साध दी है क्या कसूर है हमारा??

अगर मैं न्याय भी मांगो तो मेरा जीवन वापस आ जाएगा मेरे सपने मेरा एहसास क्या सब वापस आ जाएगा हो सकता है उन दोषियों को फांसी हो जाए परंतु मैं शायद वह ना बन पाऊंगी जो मैं पहले थी अब अब शायद किसी पर विश्वास ना कर पाऊं क्या गलती थी मेरी जो विश्वासघात हो गया मेरा?? आखिरकार हमे आजादी कब मिलेगी..ऐसे तो हम हम आजाद है पर कहीं ना कहीं लड़कियों की आजादी समाज से जुड़ी है अगर उसके साथ कुछ गलत होता है तो समाज उसकी आजादी पर रोक लगता है हम लड़कियों को आजादी कब मिलेगी..??     



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