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Shakuntla Agarwal

Romance


4.7  

Shakuntla Agarwal

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"आगोश"

"आगोश"

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आज वह चेतन की दुल्हन बन कर विदा हो रही थी और राकेश जो उन्हीं के साथ कॉलेज में पढ़ता था गाड़ी के पास अनमना सा खड़ा था जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। भावना की जैसे ही राकेश से आंखें मिली तो उसे राकेश की आंखों में प्यास नजर आ रही थी जो अधूरी रह गई थी जैसे होंठों के पास आता हुआ जाम लुढ़क गया हो।भावना ससुराल आ चुकी थी।चेतन ने घर को दुल्हन जैसे सजाया था और सेज और कमरा तो महक रहें थे।भावना के अंगों में जैसे सिरहन सी दौड़ गयी जैसे किसी ने उसे नंगे तार से छुआ दिया हो।तन - मन उमंग से हिलौरे ले रहा था।भावना को ऐसे लग रहा था कि इस रात की कभी सुबह न हो।चेतन के आगोश ने उसे मदहोश कर दिया था।चिड़िया चहचाहने लगी, लगता था सुबह हो गयी।जैसे ही भावना ने उठना चाहा, चेतन ने फिर से उसे अपने आगोश में भर लिया।वह कसमसाई और भोले अंदाज़ में बुदबुदाई - "छोड़ो न जी !" 

चेतन, भावना की मन्नतों का कोई उस पर असर नहीं हो रहा था।वह तो बन बिन पिये ही मदहोश जो हो गया था।भावना चेतन के चँगुल से छुटी, परन्तु ये क्या ? उसकी साड़ी चेतन ने अपने हाथों में थाम ली और वह उसे अपनी ओर खींच रहा था।भावना न चाहते हुए भी पुरानी यादों में खो गयी।कैसे उसे राकेश के रुप यौवन ने आकर्षित किया था।और वह उसके मोहपाश में बंधती चली गई -

राकेश - "भावना ! मैं तुम्हारें साथ अपने सपनों का महल बनाना चाहता हूँ।जिसमें मैं और तुम और अपार इश्क़ हो", यह कहकर भावना को अपने आगोश में भर लेता हैं।

भावना - "चाहती तो मैं भी यहीं हूँ।मैंने जिस सपनों के राजकुमार की कल्पना की थी, वो तुम ही हो।"कहकर राकेश की बाँहों में, बालों को अपनी ऊँगली से सहलाने लग जाती है।ऐसे ही दोनों अपने प्यार में खोये रहते हैं और सालों गुज़र जाते हैं।लेकिन कहते हैं कि मरण परण जन्म लिखें आते हैं।वही हुआ जो भगवान को मंजूर था।घर वालों के सामने भावना कि एक न चली, क्योंकि चेतन भी उन्हीं के साथ था और भावना से बेइन्तहां प्यार करता था।और बाऊजी के दोस्त का बेटा जो था और घर आना - जाना लगा रहता था।इसलिए घर वालों ने चेतन को ही उसका हमसफ़र चुन लिया था।वह अपने चेतन मन से बाहर आई और निर्वृत्त होने के लिये स्नानघर में घुस गयी और फिर एक सुघड़ गृहिणी की तरह तैयार हो गई।इतने में दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।

उसकी छोटी नन्द हाथ में चाय की ट्रे लेकर मंद मुस्कान के साथ खड़ी थी - "और भाभी ! रात कैसी रही ? भईया ने ज्यादा सताया तो नहीं।"

भावना का चेहरा शर्म से सुर्ख गुलाब हो गया था।रचिता ने जैसे ही कमरें में प्रवेश किया उसके पीछे राकेश को देखकर तो भावना की हवाईयां उड़ गई।

चेतन ने कहा - "अरे ! राकेश तुम ? आओ भई आओ, तुम्हें अपने इश्क़ के किस्से बयाँ करते हैं।"भावना ने हल्के से चेतन की तरफ आँख निकाली।चेतन ठहाके मारकर हँसने लगा - "हा, हा, हा ! अरे, ये तो अपना ही यार हैं, इससे क्या पर्दा।"और राकेश कनखियों से भावना को ऐसे निहार रहा था, जैसे कोई भँवरा कली को चूमना चाह रहा हो।भावना ने जल्दी से रचिता का हाथ पकड़ा और कमरें से बाहर निकल गई।ऐसे ही 8 - 10 दिन निकल गये।दिन पँख - पखेरू बनकर उड़ रहें थे।भावना अपने हमसफ़र की बाहों में झूलें में झूल रही थी और जिस प्यार की उसने कल्पना भी नहीं की थी, भगवान ने उससे भी ज्यादा उसकी झोली में भर दिया था।

चेतन के चाचाजी के यहाँ शादी थी सो पूरे परिवार का न्यौता था।लेकिन भावना को अपने शरीर में थकान के साथ - साथ चक्कर से भी महसूस हो रहें थे।उसने चेतन से विनती की कि - "चेतन, मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा हैं, अगर मैं शादी में कल जाऊँ तो ? "

"हाँ, हाँ, जरूर" - मैं माँ से बात कर लेता हूँ।तुम्हें कल आकर ले जाऊँगा"।पूरा परिवार भावना से हंसी - ख़ुशी विदा लेकर चला गया था।दो - तीन घंटे बाद दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।भावना मन में सोच रहीं कि कौन होगा।उसने जैसे ही दरवाजा खोला तो राकेश नज़र आया।

भावना - "राकेश ! तुम यहाँ कैसे ? घर में मेरे अलावा कोई नहीं हैं।"

राकेश (भावना की तरफ आँख मारकर कहा) -" तभी तो जानेमन, हम तुम्हारें प्यार और अपनी मदहोशी में खोने आये हैं।चेतन से सुबह - सुबह बातों - बातों में मुझे पता चल गया था।"

भावना -" राकेश, तुम क्या कह रहें हो ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।"

राकेश -" भोली मत बनों ! मैं तुम्हारें प्यार और आलिंगन को भुला नहीं पा रहा हूँ।मैं तुम्हारीं मदहोश करने वाली अदाओं में खोना चाहता हूँ।रह - रहकर तुम्हारा चेहरा मेरे ख़्वाबों में घूमता रहता हैं।मैं तुम्हारें साँसों की खुशबू को अपने ज़हन से निकाल नहीं पा रहा हूँ।मुझें अपनी पनाहों में ले लो।किसी को कुछ पता नहीं चलेगा।मुझें भी अपने प्यार से सराबोर कर दो जैसे तुमने चेतन को किया हैं।"

भावना सकते में थी और उसने राकेश से यह कल्पना भी नहीं की थी।झन की आवाज़ के साथ राकेश के गाल पर एक ज़ोरदार चाँटा जड़ दिया।

भावना (चीखते हुए) - "मैंने तुमसें इस नीचता की उम्मीद नहीं की थी।तुम तो इंसान के रुप में एक भेड़िये हो।दोस्त के नाम पर कलंक हो।मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती।निकलों मेरे घर से बाहर।"और धक्का लगाकर उसे दरवाज़े से बाहर कर देती है।उसने जल्दी से दरवाजे की चिटकनी लगाई और फिर चीखे जा रही थी - "ये तो भगवान का लाख - लाख शुक्र है कि मुझे तुम्हारें जैसे जानवर की बीवी बनने से बचा लिया, वर्ना मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो जाती।"

राकेश - "मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।भावना प्लीज सुनो, मुझे एक पल भी तुम्हारें बगैर गवारा नहीं।प्लीज भावना प्लीज।"

भावना - "तुम जिसे प्यार का नाम दे रहें हो, वह वासना है, शारीरिक भूख।शारीरिक भूख तो जानवर भी मिटा लेते हैं।असली प्यार तो वह है जो दिल में सुलगता रहें और होठों पे उफ़ तक न आये।अरे, तुम्हें तो प्यार का मतलब ही नहीं पता।तुम इस हद तक गिर जाओगे मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी।अपनी सूरत मुझे ज़िन्दगी में कभी मत दिखाना।मैं भारतीय नारी हूँ।डोली में बैठकर विदा होकर आयी हूँ।अब अर्थी ही मेरी इस घर से सजकर निकलेगी।भावना ने कहते हुए लकड़ी के दरवाज़े को जैसे राकेश के मुँह पर दे मारा।भावना सुबकने लगी और वह लगातार फफक रही थी।"उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कार रही थी |

इतने में दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।दस्तक होती ही रही।उसने देखा तो चेतन खिलखिलाते हुए हाथों में गुलाब लिए खड़ा था।भावना ने दरवाज़ा खोला और चेतन से लिपट गई।और फफकते हुए - "तुम मुझे कभी भी अपने से अलग मत करना।मैं इस जन्म में तो क्या, सात जन्मों तक तुम्हारा साथ, बस तुम्हारा साथ चाहती हूँ।" और दोनों एक - दूसरें के आगोश में खो गए, कभी भी जुदा न होने के लिये| 


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