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Pankaj Prabhat

Tragedy

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Pankaj Prabhat

Tragedy

ज़माना बदले हुए

ज़माना बदले हुए

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ज़माना बदले हुए, ज़माना सा हुआ लगता है,

अब हक़ीक़त भी, फसाना सा हुआ लगता है,

वही मैं हूँ, वही सब हैँ, अंदर भी बाहर भी,

पर इन्हें जाने हुए, ज़माना सा हुआ लगता है।

ज़माना बदले हुए, ज़माना सा हुआ लगता है….


ज़ुस्तज़ु ज़ार-ज़ार सी, आरज़ू तार-तार सी,

ख्वाब के हर छोर पर, खड़ी इक दीवार सी,

वक़्त के गुबार में, सब धुआँ-धुँआ सा है,

मुड़ कर देखे हुए, ज़माना सा हुआ लगता है।

ज़माना बदले हुए, ज़माना सा हुआ लगता है…..


मेरे होने तक, किस्सा वो एक जीता रहेगा,

इश्क था जो, वो रक्स बन बिकता रहेगा,

अब उन किस्सों के, निशाँ भी नही, मगर,

किस्सा वो छेड़े हुए, ज़माना सा हुआ लगता है।

ज़माना बदले हुए, ज़माना सा हुआ लगता है…..


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