STORYMIRROR

Rajeev Tripathi

Abstract Romance

4  

Rajeev Tripathi

Abstract Romance

ज़हन में प्यार

ज़हन में प्यार

1 min
321

सिवा तुम्हारे ज़हन में नाम

कोई आता ही नहीं

इक तू है कि हमें ग़म में

बुलाता ही नहीं


सारे रिश्तो को तो

आज़मा कर बैठा है

फिर भी तुझे ग़म मेरा

सताता ही नहीं


बैठे रहेंगे ग़ुरूर को लेकर वो

राह सीधी उन्हें कोई दिखलाता

ही नहीं

ख़ुशी से मेरी उन्हें सरोकार ही नहीं


क्या आएगा वक़्त पर काम

जो आता ही नहीं

भुलाने वाले मुझे 

ज़रा तू भी सुन ले

उलझे रिश्तो से कोई

हाथ बढ़ाता ही नहीं


सुकून पाने की हसरत में

ज़िन्दा हूंँ अब तक

मेरी अर्थी को कोई कांधा

लगाता ही नहीं


माना कि जिंदा हूंँ अब तक

मुझे ज़िन्दा का ख्याल भर भी

आता ही नहीं

प्यार में मैं भी हद से गुज़र जाता

मगर ऐसा कोई शख़्स नज़र

आता ही नहीं  


मौत से पहले वह घर

में आ जाए

छोड़ चुके शख़्स को कुछ याद

आता ही नहीं

सिवा तुम्हारे ज़हन मे नाम कोई 

कोई आता ही नहीं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract