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V. Aaradhyaa

Classics Inspirational

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V. Aaradhyaa

Classics Inspirational

ज़ब निहारा मैंने अपना अंतर्मन

ज़ब निहारा मैंने अपना अंतर्मन

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ज़ब ज़ब देखा मैंने मन का दर्पण,

निराशा हताशा का किया मैंने तर्पण !


उम्र लिख गई कई परत जो तहरीरें,

कुछ गौर से निहारा ज़ब मैंने अंतर्मन !


अब कितना कुछ बदल गया रे मन,

जाने कहाँ गई वो मेरी चंचल चितवन !


कब खेली थी मुस्कान मेरे अधर पर,

ज्ञात नहीं कुछ अब मेरे ह्रदय पट पर !


कुछ तो छलावा कुछ है सत्य चराचर,

स्वीकार कर ले अरु, वक़्त का परिवर्तन !


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