ज़ब निहारा मैंने अपना अंतर्मन
ज़ब निहारा मैंने अपना अंतर्मन
ज़ब ज़ब देखा मैंने मन का दर्पण,
निराशा हताशा का किया मैंने तर्पण !
उम्र लिख गई कई परत जो तहरीरें,
कुछ गौर से निहारा ज़ब मैंने अंतर्मन !
अब कितना कुछ बदल गया रे मन,
जाने कहाँ गई वो मेरी चंचल चितवन !
कब खेली थी मुस्कान मेरे अधर पर,
ज्ञात नहीं कुछ अब मेरे ह्रदय पट पर !
कुछ तो छलावा कुछ है सत्य चराचर,
स्वीकार कर ले अरु, वक़्त का परिवर्तन !
