युद्ध
युद्ध
कौन चाहता युद्ध यहां पर
जो बैठा सत्ताधारी है
या चाहत रखता गद्दी की
कौन ऐसा व्यभिचारी है....!
मृत्यु, तबाही और आंसुओं की धारा
लाता कौन यहां पर है
कौन बढ़ाए भुखमरी
और गरीबी की बीमारी है.....!
सबको करना राज यहां पर
सब के मन में उपजी लालसा
सत्ता की भारी है
युद्ध ऐसी भीभत्स बीमारी
इसकी ना कोई दवाई है.....!
इक बार यदि छिड़ जाए यह
तब होती चारों तरफ बर्बादी है
हुए हैं जब जब युद्ध यहां पर
लोगों ने देह से जान गवाई है.....!
खुदगर्जी के आगे बेहाल हुए
मासूम जनता ने
अपना सब कुछ उसमें गवाया है
देश के देश नष्ट हो गए
पर फिर भी झुकने की कोई ना बारी है.....!
ना निकले कोई आगे मुझसे
इसलिए युद्ध की तैयारी है
उठा कर देखो लोगों तुम
दिया क्या इस युद्ध ने हम सबको
बस दूरी मनो की बड़ाई है.....!
फिर भी कोई कहां है रुकता
द्वेष और ईर्ष्या की आग तरफ फैलाई है
मिट्टी की कब नफरत की यह बीमारी
कब तुम अपने अंदर सब मिलकर
अमन के दीप जलाओगे...!
