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Shweta Mangal

Classics


5.0  

Shweta Mangal

Classics


ये शाम

ये शाम

1 min 325 1 min 325

ये शाम जब आती है

अपने साथ लाती है


यह रंगीन आसमान

छितराये बादलों में

छुपता सूरज

जैसे माँ के आँचल में

 छुपता लाल 


और यह खिलखिलाता चाँद

 खेलता असंख्य तारों से

 जैसे खेलते बाल कृष्ण

गोपियों संग


और इसी के साथ आ जाती है

कुछ यादों की लहरें

दिल के शांत समंदर में

होले से हिचकोले लेते हुये


ये यादें तोड़ सा जाती है

तो कभी जोड़ भी जाती है

 दूर उन सब अपनों से रहते हुए 


बहुत जालिम है यह शाम

जब भी पाया अकेला खुद को

तो रुला जाती है

और जब हो साथ किसी का

 तो हँसा जाती है


कोई भी नहीं बच पता

 इसकी रंगीनियों व तन्हाइयों से


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