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Shweta Mangal

Abstract


5.0  

Shweta Mangal

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जिंदगी

जिंदगी

1 min 305 1 min 305

जिंदगी में तुम्हें बहुत कुछ माना था

जिंदगी में तुम्हें बहुत कुछ समझा था

जिंदगी में तुम्हें शायद चाहा भी था


जिंदगी में तुम्हारी

मेरा भी हक़ है तुमसा

यही तुमने समझाया था मुझे


पर एक दिन

न जाने यह सूरज

किस लालिमा को लिए उदय हुआ


हाँ अब मैंने जाना यह

लालिमा इतनी अपनी सी क्यों लगी

यह तो मेरे दिल का खून ही था


और उस दिन

डूबते सूरज के साथ

डुबो दिया तुमने मुझे भी

मेरे अविरल बहते आंसूओं की बाढ़ में


तोड़ दिए वो सारे रिश्ते

वो सारी आशाएं तुमने

एक तूफ़ान की तरह आए

और रह गई

एक नीरवता हमारे बीच।


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