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Ravindra Shrivastava Deepak

Romance Classics Fantasy

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Ravindra Shrivastava Deepak

Romance Classics Fantasy

याद आ गई...

याद आ गई...

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तुम मुझे भा गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


छाए थे काले बादल ग़मों के,

तुम्हारा स्पर्श घेरा बन मुझपर छा गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


रात काली, दिन धुंधले से लगते थे,

मेरी रौशनी तुम थी,

मेरा सूरज बन तुम आ गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


तन्हाई के थपेड़ों से उजड़ा था मैं,

बन बसंत की बहार तुम ज़िन्दगी में छा गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


जिस दौर के लिए बेचैन था अबतक,

उसी दौर को बाकायदा साथ ले तुम आ गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


मुसल्सल एक उधरी सी जिंदिगी थी कभी,

खुश है वो जिंदिगी की उसकी तुरपाई आ गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


प्यासा बन जो भटकता रहा अबतक,

नदी बन तुम खुद मेरे पास आ गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


चकोर था मैं, चाँद की दरकार थी,

बन चाँद तुम मेरे पास आ गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई


आख़िर "दीपक" अकेले जलता कैसे,

साथ देने बन "बाती" तुम आ गई,

देखो न ! तुम्हारी याद मुझे आ गई।


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