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Prem Bajaj

Romance

3  

Prem Bajaj

Romance

वो सतरंगी पल

वो सतरंगी पल

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सावन की पहली बारिश ने तुम्हारी यादों की दस्तक दी है, 

मन- धरा पर तुम संग बीते लम्हों की सुनहरी धूप छाई है।

यादें सता रही सावन की पहली बारिश की,

आते ही ठंडी - ठंडी रिमझिम बरखा के खींच लिया था 

तुमने मुझे चुपके से, भर लिया था गर्म आगोश में अपनी,

टकराई जब गर्म सांसें , सुर्ख होंठ मेरे फड़फड़ाए कुछ 

कहने को, ना कहने दिया कुछ भी , टकरा दिए जाम अधरों के।


खेलने लगी उंगलियां तुम्हारी कस्तुरी से मेरी,

कानों में मेरे गुनगुना रहे थे तुम ,

शफ्फ़ाक बदन को जब समेटा था तुमने बाहों में,

स्पंदन सा हुआ मेरे तन- मन में ।

टूट कर बिखर गई थी बांहों में तुम्हारी,

रूक गई थी सांसें पल भर 

चर्म- सीमा का आनन्द लेने को।

याद आ रहे हैं वो संतरंगी पल, बिन तुम्हारे अब 

ना कटे ये घड़ियां , कब आएगा वो समां सुहाना,

होगा जब फिर से हमारा मिलन ।

अब के आओगे तो फिर ना जाने दूंगी मैं तोहे सजन,

आ फिर से लौटा दे मेरे वो सतरंगी पल। 



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