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Supriya Bikki Gupta

Classics

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Supriya Bikki Gupta

Classics

वो सतरंगी पल

वो सतरंगी पल

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खड़ी हूँ उस मोड़ पे जिंदगी के, 

गुजारा है, हर दौर अपनी उम्र के, 

आज देखूँ जो मुड़ के पीछे, 

पल- पल को याद करते - करते, 

याद मुझे आए मेरे " वो सतरंगी पल "।


वक़्त का वो दौर था कुछ ऐसा, 

हर घड़ी, हर पल लगता था सपने जैसा। 

आए थे वो जिंदगी में मेरे कुछ ऐसे, 

पतझड़ भी लगते थे मुझे सावन जैसे। 


बंद आँखों में जब मैंने

ख्वाबों को सजाया,

उन्होनें खुली नजरों से,               

सपनो को जीना सिखाया। 

खुद को तलाश रही थी,                


जब भीड़ में इस जमाने की, 

अनमोल हूँ मैं जताया, और,              

वो वजह बने मेरे मुस्कुराने की। 


मेरी सफलता, मेरे ख्वाब,

उनसे ही मुकम्मल हुए,

आँधियाँ जिंदगी की भी थम गए, 

हर घड़ी वो जो मेरे साथ हुए। 


देखा था आँखों में उनके,

प्यार भरा एक कतरा। 

जब उन जैसा नन्हें फूलों ने, 

खाली जीवन को हमारे भरा। 


नन्ही कदमों के आहट से।               

हमने सपने कई सजाऐ,

एक - दूसरे के साथ से हमने,           

सारी जिम्मेदारियों को बड़े प्यार से निभाऐ। 


मीठी शरारतों से उनकी ही, 

कल हमारा मुस्कुराया था, 

ले के हाथों में उन्होनें मेरा हाथ, 

हर पल को प्यार से सजाया था। 


बीती हुई उन यादों को, उन लम्हों को, 

जी लूँ कुछ ऐसे फिर एक बार, 

" वो सतरंगी पल " दोहराए खुद को, और 

आँचल में अपने समेट लूँ, 

उनका प्यार फिर एक बार। 


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