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Diksha Gupta

Romance

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Diksha Gupta

Romance

वो एक गुलाब...

वो एक गुलाब...

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मेरी डायरी के पन्नों तले

न जाने ये कब से दफ़न हैं

याद़ों का बोझ कुछ इतना है,

कि बस अब दम छुट हि रहा है।

सब कुछ शिखर पर है

यहाँ की हवा में लेकिन कोई नमी नही,

पर ज्यों ही ये मुझे छु गुजरती है

एक गरमाहट भरी साँस

मेरे सीने में उतरती है।

मानो, की जैसे कल की ही बात हो,

इन पन्नों पर एक डगर सीधी भी थी।

एक गुलिसतां खिला था,

कई छोटी बड़ी याद़ों के गुल इनसे ही निखरे थे|

इस वसंत का

वक़्त क़ातिल बन बैठा था।

न जाने कितनो के शव से ढका ये पहाड़,

हमारे प्रेम की रूह का बसेरा भी बन बैठा है|

उसका रंग ढल रहा है

बदन पर कुछ काले छीठे हैं।

उम्मीद की एक डोर फिर भी पकड़ी है,

सो अभी भी टूटा नही,

पर सफ़ेद पन्नों के शिया लफजों में

अपना इत्र बिखेर दिया है।

हर बरस बस आज के दिन

मैं भूले-भटके गुजरती हूँ इन रास्तों पर

फिर ज्यों ही इससे मिलती हूँ

पुरानी यादों का एक रैला गुजर जाता है।

उसकी अँगुली थामे, मैं भी

इस कारवाँ में शिरखत करती हूँ।

तुम तलक ले जाए

उन रास्तों पर निकलती हूँ।

ये सफ़र मुमकिन है, बस उसकी के कारण

वो एक गुलाब

जो तुम्हारे बाग से,

मेरे दिल-ये-बाग़ तशरीफ लाया था



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