वक्त बेपरवाह
वक्त बेपरवाह
ना इसके लिये , ना उसके लिये,
वो रुकता कहाँ कभी किसी के लिये।।
चलता अविरत ना रुके ना थके,
ज़िन्द है एक जिद्द चलने के लिये।।
थम सकता है धार जम सकता है पानी,
फिर पिघलता है बह चलने के लिये।।
जुर्रत भी ना करना कभी जलाने की उसे,
सर पे कफ़न बांधे खड़ा जो मरने के लिये।।
साया भी कभी कभी साथ छोड़ जाता,
रात का इंतज़ार अगर सुबह तक के लिये।।
रुख़ लहरों के भी बदल सकता मगर,
किनारों में दम हो अगर टकराने के लिये।।
इन रिश्तों ने मुझे उलझाये रक्खा आज तक,
कोशिश करता जो इन्हें सुलझाने के लिये।।
टूट जाने से अच्छा छूट जाये तो मंजूर,
पकड़ ढीली रखता फिसलाने के लिये।।
टूट जाते अक़्सर डोर उन पतंगों के,
ख्वाहिशें जिनकी, आज़ाद मरने के लिये।।
फिर भी बदनाम हूँ मैं, बावजूद परवाहों के,
मशहूर हो गये वो बेपरवाही के लिये।।
