विकलांग
विकलांग
विकल अंग होंगे लेकिन
मन कुंठित न होने पाये
होगा शरीर ये शिथिल मगर
चित्त हिरण की गति पाये
मैंने ये पढ़ा कि हाथों की
रेखाएं न हो तो भी क्या
भाग्य हुआ करते हैं सदा
जैसा जिसने हो कर्म किया
सूरदास की बोली में
यही समझ में आता है
कि रंग भरी इस दुनिया को
बिन आँखों देखा जाता है
बिन कान सुनी जाती करुणा
प्रेम बिना इस काया के
अपनेपन के उदबोधन में
शब्द नहीं है माया के
होंगे तो होने दो ना
मेरे सब अंगों को अपंग
मेरा मन चंचल स्वस्थ सदा
संवेदित हो न करो तंग
विकल अंग होंगे लेकिन
मन कुंठित न होने पाये
होगा शरीर ये शिथिल मगर
चित्त हिरण की गति पाये।
