विधान प्रदर्शन
विधान प्रदर्शन
उसकी आँखें जुगनू थी जिनमें ख़्वाब सँजोये थे
उसने मन के धागे में आशाओं के मोती पिरोये थे
मन का पंछी उड़ रहा था कल्पना के गगन में
मिट गया था भेद सच्चाई का झूठ के आंगन में
सपनों का एक राजकुमार उसके जीवन मे आया था
सपनों की चित्रकारी में उम्मीद के रंग भर लाया था
उसने भी खुद को फर्श से अर्श पर बैठा पाया था
इस राह में कांटे हैं कितने उसे समझ ना आया था
उसकी ज़िंदगी मे शोहरत की चमक इस तरह से छाई थी
अपने रिश्तों मे दूरियों की वजह उसे समझ ना आई थीं
लेकर नशे का सहारा उसने अपनी तन्हाई मिटाई थी
डूब रही थीं शख्सियत और वो संभल ना पाई थी
अपनी तन्हाई का सबब उसने दुनिया को ठहराया था
शोहरत की चमक ने उसे ना जाने किस तरह भरमाया था
हाथ से छूटा रहा था वो सब जो उसने कमाया था
बेखबर इस बात से उसने अपना सबकुछ गवांया था
गुज़र गया था समय उसने जब होश वापस पाया था
कैसे ले वो वापस सब कुछ जो कुछ उसने गवांया था
जीवन समाप्त किया फिर उसने ये कैसा मार्गदर्शन था
अंत समय में फिर उसका जीवन विधान प्रदर्शन था!
