STORYMIRROR

Akanksha Gupta (Vedantika)

Tragedy

4  

Akanksha Gupta (Vedantika)

Tragedy

विधान प्रदर्शन

विधान प्रदर्शन

1 min
251

उसकी आँखें जुगनू थी जिनमें ख़्वाब सँजोये थे

उसने मन के धागे में आशाओं के मोती पिरोये थे

मन का पंछी उड़ रहा था कल्पना के गगन में

मिट गया था भेद सच्चाई का झूठ के आंगन में


सपनों का एक राजकुमार उसके जीवन मे आया था

सपनों की चित्रकारी में उम्मीद के रंग भर लाया था

उसने भी खुद को फर्श से अर्श पर बैठा पाया था

इस राह में कांटे हैं कितने उसे समझ ना आया था


उसकी ज़िंदगी मे शोहरत की चमक इस तरह से छाई थी

अपने रिश्तों मे दूरियों की वजह उसे समझ ना आई थीं

लेकर नशे का सहारा उसने अपनी तन्हाई मिटाई थी

डूब रही थीं शख्सियत और वो संभल ना पाई थी


अपनी तन्हाई का सबब उसने दुनिया को ठहराया था

शोहरत की चमक ने उसे ना जाने किस तरह भरमाया था

हाथ से छूटा रहा था वो सब जो उसने कमाया था

बेखबर इस बात से उसने अपना सबकुछ गवांया था


गुज़र गया था समय उसने जब होश वापस पाया था

कैसे ले वो वापस सब कुछ जो कुछ उसने गवांया था

जीवन समाप्त किया फिर उसने ये कैसा मार्गदर्शन था

अंत समय में फिर उसका जीवन विधान प्रदर्शन था!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy