वेतन और काम
वेतन और काम
काम नही – वेतन नहीं
काम है, तो वेतन है।
अक्सर यही कहा जाता है।
ईश्वर तो अपने काम का,
कोई भी वेतन नही पाता है।
बस सब बनाये जाता है।
काम है, तो वेतन है ।
बस इंसानी कामों को,
वेतन दिया जाता है।
काम करा कर,
धनाढ्य सेठों द्वारा,
वेतनभोगी का,
आधा हिस्सा मार लिया जाता है।
वो जीवन की जरूरतें भी,
बड़ी मुश्किल से जुटा पाता है।
साहूकार बनता जाता है,
दूसरे के मारें वेतन से,
तनता जाता है।
फिर अपने नीचें,
काम करने वालों पर,
अपशब्दों से चढ़ता जाता है।
वेतन पाने वाला,
मंहगाई से दबता जाता है।
वेतन के लिए,
जद्दोजहद करता रहता है।
