उदरकुण्ड की समिधा बनते हैं
उदरकुण्ड की समिधा बनते हैं
सौभाग्य से अबके छुट्टियों में अपने गाँव जाना हुआ !
यादों की पोटली में जुड़ा एक और खजाना हुआ !
वहाँ जाकर बड़े गौर से देखा मेहनतकश किसानों को,
फ़सल उपजाते रोपते व काटते हिम्मती जांबाजों को !
उन्हें यूँ देखकर कुछ मेरे जेहन में आई कुछ एक पंक्तियाँ !
सुना रही हूँ अपने दिल के करीब रही वही स्वरचित उक्तियाँ !
यह किसान गेहूँ, मकई, ज्वार, बाजरा और उपजाते धान हैं !
सबके उदर-कुंड की समिधा बुझाते यही धरतीपुत्र किसान हैं !
अगर ये कपास उपजाते हैं तो, तन की शोभा बढ़ जाती है !
ढलते वय पर अमराई पर रंगत कुछ, तरुणाई की चढ़ जाती है !
यह हमारे बचपन के अभिरक्षक और हमारे यौवन की शान हैं !
सबकी क्षुधा मिटाते अन्नदाता बने हुए हमारे यही किसान हैं !
मात्रा और भार समान होने पर ही तो जीवन लय बाधित होती है !
जो अपने आकलन और संयोजन से ठीक हो सकती है !
