उधारी के कुछ लम्हे
उधारी के कुछ लम्हे
तेरे उधार के वक्त से
चुराकर एकाकीपन के कुछ लम्हे
तकिये के नीचे छिपा कर रखे थे मैंने,
रात करवटें बदलती रही तो
चादर की सिमटी सलवटों से
एक मासूम-सा लम्हा
ऊँघता हुआ मुस्कुरा दिया,
फिर उछल कर
बैठ गया मेरे रसीले लबों पर।
उस वक्त टूटी छत पर
कोई और न था हमारे सिवा
एक दूजे से दिल की बातें करते-करते
न जाने कब नींद ने जकड़ लिया मुझे,
लाल मखमली चादर में
भोर होते ही जब आँख खुली तो
खुद को अकेले पाया,
वो नन्हा-सा नादां तन्हाई का पल
चुराया था जिसे तेरे वक्त से
नामालूम किस दिशा चल दिया,
कितने मनमोहक, कितने दिलकश
कितने उल्लसित, कितने प्रफ्फुलित
थे उस रात के यादगार लम्हे ,
क्या फिर से लौटेंगे ?
वो अद्भुत चिरस्मरणीय क्षण
वो अनूठे अविस्मरणीय पल ?

