उड़ान.....पंछियों की
उड़ान.....पंछियों की
गोधूलि की लालिमा और दूर आसमां से
अपने नीड़ में लौटते पंछियों को
निहारती तृप्त आंखें मानो
यथार्थ को समेट लेना चाहती
बस ऐसे ही ढ़लती सांझ में
कई स्मृतियां मन की किवाड़ से
झांकती पलकों पे उतर आयी.....
एक एक तिनका चुनकर
घरौंदे बनाती संवारती
मधुर क्षणों को जीती चिड़ैया
घर आंगन में इधर उधर
चहचहाती फुदकती
मन को दो पल चैन और
मुस्कुराहटें दे जाती नन्हीं चिड़ैया......
ना जाने क्यों तूफां कभी
कभी कहर बरसाता
पल भर में "छत"
क्षत विक्षत हो जाता
घौसलो का बिखरना.....
बेहिसाब दर्द , आंसू छलकना
समझ ना पायी कुदरत और
मौसम का ऐसे मिलना......
एक रोज देखा मैंने
पंछियों का फिर पंख फैलाना
तिनके की तलाश में उड़ान भरना
उठकर संभलना और कोशिशों की
कतारों में अव्वल रहना
हौसले जज्बे की मिसाल दे गया......
सोचती रही विस्मय से
छोटी छोटी चिड़ैयों की उड़ान
कितना कुछ बयां कर गयी
मन को समझाया
जोश उमंग से खुद को घिरा पाया
काली घटाओं को चीर उड़ने को हूं तैयार......
