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Neeraj pal

Abstract

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Neeraj pal

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उदास मन

उदास मन

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एक नजर मुझ गरीब पर भी डालो, जो द्वार तुम्हारे आया हूँ।।


देख दुनिया का विकराल रूप, मन हुआ बड़ा उदास है।

 जिन को था दिया सब कुछ अपना, उनसे ही धोखा खाया है।।


 मान बैठा दुनिया को सब कुछ, जो महज़ एक सपना था।

 माया जाल बनी मेरी सौतन, जिसने तुमसे दूर कराया है।।


 कर्म किया जो मैंने चाहा, पशुवत बना मेरा अब जीवन।

 तड़प रहा अब जल बिन मछली, अवसाद ने जाल बिछाया है।।


 विषय-वासना अब दूर न होती, मन व्यथित है दूर भगाने को।

 उद्धार प्रभु अब तुम से ही होगा, तू ही सब में समाया है।।


 कुब्जा नीच भीलनी तारी, तारा तुमने सकल जहान है।

" नीरज,फँसा पाप कर्मों में ऐसा, तुम बिन निष्फल यह काया है।।


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