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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy

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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy

तुम यहीं कहीं हो..!

तुम यहीं कहीं हो..!

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अभी ठहरे थे तुम यहीं 

तुम बेशक अब नहीं हो 

पर तुम 

अब भी मुझमें कहीं हो ।

तुम मेरी नींदो में 

मेरे ख्वाबों में 

तुम धड़कनों में

तुम मेरे आसपास यहीं हो।

तुम सूरज की पहली किरण में 

तुम हवा के सरगम में 

तुम नदी के बहते जल में

तुम आज हो

तुम ही मेरे कल में।

बस तुम नहीं हो

या ये कहूं 

तुम मेरे आसपास 

अब कहीं हो।

तुम बारिश में 

तुम बूंदों में 

तुम चांद के साथ

तुम डूबते सितारों में ।

तुम हर गहराती रातों में 

तुम टिमटिमाते जुगनुओं में 

तुम खामोशी में 

तुम अनकही बातों में।

तुम कानों में 

कुछ कह जाती हो 

तुम हवा बनकर गुजर जाती हो 

सरगोशियां जब करती हो

छू लेती हो तुम मेरे जिस्म को ।

इशारों से तुम 

कुछ कह जाना

अगर रुकना चाहो तो 

तो दो पल ठहर जाना 

मेरे बहते हुए अश्कों में।

तुम ओझल सी हो गई हो 

यहीं थी यहीं

अब कहां खो गई हो 

मैं महसूस अब भी करता हूं

तेरे हाथों की छुअन को 

कहीं पास अपने

तेरे होने को।


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