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Rajiv Jiya Kumar

Abstract Romance

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Rajiv Jiya Kumar

Abstract Romance

तुम बंदगी।

तुम बंदगी।

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पल की दूरी तुमसे

फुसफुसा कह तो गया जानां

हर खुशी तुमसे 

सजी होंठों पर हँसी तुमसे 

चैन तुमसे

ख्वाब से भरे नींद 

इन नैनों में तुमसे

कुनबे में अपने

तुम संग तो जन्नत सजा है।।


यह दूरी न भाए 

कहना तो चाहूँ यह बड़ा सताए

पर बेबस तो शक्ति तुमसे

जटिलता तो युक्ति तुमसे

सच कहता हूँ  

मुक्ति हर वेदना की 

इस काया की तुमसे

आँचल की ओट में तेरे

हर मन्नत का दीप जला है।।


सिर पर हाथ तेरा

रब बना देता तुझे मेरा

हर रस्म की रंगत 

हर जख्म की राहत 

हर साँस साँस की चाहत

मिला है तुमसे

तेरी कायनात के साये तले 

बगिया का हर पुष्प सजा है।।

        सजन तुम साथ चले

        सफर सहज बड़ा रहा है

        चंद कदम पर मंजिल दिखा है

        बस हाथ तेरा हाथों में हो

        यही तो हमने चाहा है।।

                           ✍राजीव जिया कुमार, 

                             सासाराम,रोहतास,बिहार।

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