तुम बिन कुछ नहीं
तुम बिन कुछ नहीं
तुझसे ही रूप मेरा, लागा तुझसे जब से जिया रे
तू ही बना फितूर मेरा रूह को सुकून सा मिला रे
तुझसे ही दुनिया रंगीन मेरी तू ही हसीन सपना रे
प्यारा लागे जग सारा साथ पिया हो जब अपना रे
तुम बिन काली रतियाँ, बिन तुम स्वर ना कोई राग रे
मूर्त तेरी बसी इन अंखियाँ तुझसे है सोलह श्रृंगार रे
तुम बिन कुछ नहीं है मेरा, रह जायेंगे अधूरे सारे ख्वाब रे
चल संग चले लेकर कश्ती अपनी ऊंचे पहाड़ों के पार रे।
