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Kamal Chandra

Tragedy

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Kamal Chandra

Tragedy

*टूटते दरकते पहाड़*

*टूटते दरकते पहाड़*

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टूटते दरकते पहाड़

जिंदगियां हराते पल में।

सुःख को झट दुःख में बदलें

कहर बन बरसते पल में।।


कर छलनी सीना पहाड़ों का,

हम ही उन्हें कमजोर करते।

कभी टनल, कभी खनन कर,

उन्हें मूल जड़ों से हिला देते।।


अब वे कहर बरपा रहे हैं जब,

कोस रहे हैं हम मौसम को।

कभी शिमला तो कभी कुन्नूर,

दांव लगाते हम जीवन को।।


प्रकृति का हम सम्मान करें,

तभी पालिका बन पायेगी।

जो आँचल हम विदीर्ण करें,

तब यही खेल दिखलाएगी।।



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