टूटते दरकते पहाड़
टूटते दरकते पहाड़
टूटते दरकते पहाड़
ज़िन्दगीयाँ हराते पल में।
सुःख को झट दुःख में बदलें,
कहर बन बरसते पल में।।
कर छलनी सीना पहाड़ों का,
हम ही उन्हें कमजोर करते।
कभी टनल, कभी खनन कर,
उन्हें मूल जड़ों से हिला देते।।
अब वे कहर बरपा रहे जब,
कोस रहे हैं हम मौसम को।
कभी शिमला तो कभी कुन्नूर,
दांव लगाते हम जीवन को।।
प्रकृति का हम सम्मान करें,
तभी पालिका बन पायेगी।
जो आँचल हम विदीर्ण करें,
तब यही खेल दिखलाएगी।।
ये महल- दुमहले भरी तिजोरी,
अतृप्त वासना की है पहचान।
मिलजुल कर दो रोटी खाँयें,
प्यार से अपने सुःख -दुःख बाँटें।
बैठ जमीन पर रसोई में ही,
माँ खिलाती थी खाना जब।
10 फिट लम्बी डाइनिंग टेबिल,
पर 10 व्यंजन फीके लगते अब।
हमको इतना ही दीजे भगवान,
घर से भूखा न जाये मेहमान।
प्यार से दिल भरे, अन्न से पेट,
मिलें जब भी प्यार से मिले इंसान।
