समय का फेरा
समय का फेरा
चम्पई सांझ के ललाट पर।
बिंदी नुमा कांसे का सूरज देखा।।
झीनी-झीनी ओढ़े चुनरिया।
छम्म से रात को आते देखा।।
ढलते दिन के साये में।
शाम को मुस्काते देखा।।
धीरे-धीरे गहन हुई तो।
निशा को भी इठलाते देखा।।
कहते हैं ये है पीठ धरा की।
जहाँ तिमिर का फैला राज।।
मुखमण्डल चमक रहा धरा का।
वहाँ सूरज भी दमक रहा है।
पंछी लौट रहे नीड पर।
गोधूलि की बेला है।।
पदचापों से उठती रज है।
सन्ध्या बाती की बेला है।।
शनैः- शनैः गहराती रजनी ने।
अपना रंग दिखाया है।।
निरख रहा है हर दृश्य।
छाया गहरा अंधियारा है।।
निद्रा योगिनी के वश में आकर।
आधीन हुआ जग सारा।।
समय पर उषा ने दे दी दस्तक।
सूरज के आगे जग है नतमस्तक।।
