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Kamal Chandra

Others

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Kamal Chandra

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स्टेशन पर बूढ़ी माँ

स्टेशन पर बूढ़ी माँ

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था मथुरा का स्टेशन।

अनमन सी बैठी इक बूढ़ी माँ ।।

पूछा जाकर क्यों बेचैन हैं।

व्यथा सुनाती वह बूढ़ी माँ।।

बेटा बोला बैठ यहाँ मैं पानी।

लेकर आता हूँ , रोने लगी बूढ़ी माँ।।

अनजान शहर घिरता अंधियारा।

सशंकित सी हो रही बूढ़ी माँ।।

यूँ तो है यह कृष्ण की नगरी।

पर यहाँ कंस भी हैं विराजे।।

बच्ची जैसी सुबक रही थी बूढ़ी माँ।

रक्षक भी देख रहे थे तमाशा।

पब्लिक भी करती काना -फूसी।।

कोई नहीं है आया बढ़कर।

ट्रेन हमारी आई स्टेशन पर।।

हमने बदला अपना विचार।

मिले वहाँ के बड़े साहब से।।

NGO का फिर न. लेकर।

बात की फिर निश्चिंत होकर।।

सखी हमारी बोली गुस्से में।

कभी वह भी होगा स्टेशन पर।।

आंखें भरकर रोक रही बूढ़ी माँ।

न हो ऐसा कभी क्षमा करूँ मैं।।

सफल रहे और सुखी रहे वह।

जीवन में सब काम करे वह।।

मेरा क्या मैं तो सूखा पत्ता हूँ।

आशीष दे रही थी बूढ़ी माँ।

बेटा छोड़ गया तो क्या ।

घर नया मिलेगा तुमको अब।।

सौंप सुरक्षित हाथों में हम।

चले वहां से आशीष दे रही बूढ़ी माँ।।

             

            

      


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