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Rahim Khan

Abstract


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Rahim Khan

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तोड़ दे बंधन

तोड़ दे बंधन

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तोड़ दे बंधन की जंजीरों को

मजहब की उन बद्दनजीरों को, किताबों की उन लकीरो को,पत्थर की नकीरों को, अपने अन्दर बने जिहाल्लत के जख्खीरों को,

मिटा दे, बन्धन की इन फसीलों को,

ये अ मीरों का पॆंतरा हॆ, निर्बलों की गर्दन का उस्तरा हॆं, हिन्दु या मुसलमां बना कर, अपना मक्सद बनाने का पेंतरा हॆ-------

तुझे अल्ला ने अगर बनाया हॆ? तो तुझे बिना सिनाक्त के ही क्यों बनाया?

अगर मालिक को ये मंजूर होता, तो तुझे हिन्दु या मुसलमां बनाया होता ।

ये सब तो जालिमों के फितूर हॆं, यह कोई मालिक का दस्तूर नहीं, मजहब के ठेकेदारों को जलन हो, मेरा कोई कसूर नही।

Someदरत के निजाम पे किसी का कुछ कहां चलता हॆं, गरीबों के लिए ये जाल फॆलाये रखते हॆ, पींगे डींगे खूब मारते हॆ ,जन्म मोत पे ये बेबस से दिखते हॆ।

बेवकूफ तो तू हॆ बन्दे, जो समझता नहीं हॆ इनके फन्दे

दुनिया जला रहे हॆं, ये मजहबों के मुसटण्डे, इस दुनिया को जला कर, अगली दुनिया 

की महफिल दिखाना, ये इनके धन्धे हॆं ।

इन्हीं की आड़ में राज बने ताज बने, सरहदें ऒर हिन्दोपाक बने

वो आज भी परवाना बना हॆ, गरीब की झोपड़ियों का शमा बनाया हॆ, जो उसकी झोलाछाप में ना आए उसके लिए शोला बना हॆ, 

जाग जा ऎ बन्दे, तेरे मूल को मिटाने का यह टोला बना हॆ ।

कुदरत ने तो हमें एक जमीं दी, उसी ने कहीं जर्मन जापान या हिन्दुस्तां बनाया, जन्म से न कोई हिटलर सिकंदर था , दास्तां के इन खंजर हाथों ने ही जनरल, सदर या सियासत के किरदार बनाया"

उठ जाग हुंकार भर ,ये सब पतित हथकण्डे हॆं, इनसे मत डर, समाजवाद के उस सम्बोधन को याद कर, हिमालय के उस पार की उस ज्वाला को इधर धधका दे, जॆसे लेनिन ने जार को जमींदोज किया था

मजहब की इन लकीरों को अपनी हथेली से मिटा दे, मजहब के उन मुसटण्डो को अपनी चॊखाट से उठा दे, अपने वर्कचार्ट से मजहब के सब कर्मकाण्डों को हटा दे, मजहब के सरदारों से अपना ईमान उठालो, ये सब तो इनके मायाजाल हॆं, उन्हें जलाकर, अपनी आजादी का सम्मा जला दे"

मजहब के इन मक्कारों ने खूब उलझाया हॆ हम को चमतकारों में,

कभी यमराज का हाहाकार दिखाया, कभी कायामत का दरबार दिखाया, कभी इसराफील का किरदार दिखाया,कुल मिलाकर उन्होनें इंसान की हकीकत को ही बेकार बताया,

उठ जाग, अपनी ओकात को कम ना समझ,

इन पत्थर दिल पाषाणों से अपने उत्थान की आस न लगा, ये वो दुकानदार हॆं जो भगवान को भी बिलॆकमॆल करते हॆं

मजहब के ठेकेदारों ने बन्धन की जंजरो से मालिक तक को जकड़ लिया, उसको अपने मक्सद के मुताबिक रंग रूप दिया, उसके प्रकाश को खण्डहरों में कॆद किया, अपनी दॊललत से कर्मकाण्डों का खेल रचाया,

तू पागल बनकर उसमें क्यों गुमराया """

जातपात का जंजाल उसने अपने खातिर फॆलाया ,तू मासूम बनकर उसमें चकराया, अपने ही घर में बनगाया पराया, सभ्यता के इस ढोंग में ,तुझे पिसता देख वो हमेशा अपने गॊरव पे मुस्कराया,

बन्धन के इस दॊर को, जीवन के इस नीरस तॊर को, अंधकार के इस बेमानी जोर को,

उठ, ललकार

ललकार

भेदभाव के विकारों को

धर्म के साहूकारों को

धरा के बंटादारों को

नफरत के उन किरदारों को  इंसानियत के विभाजनकारो को

तोड़ दे

तोड़ दे उन बन्धनों को, तेरी कायरता को मेने आज ललकार है।


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