STORYMIRROR

Santosh Shrivastava

Abstract

3  

Santosh Shrivastava

Abstract

नजाकत वक़्त की

नजाकत वक़्त की

1 min
514


रफ्ता रफ्ता

गुजर रहा है

वक़्त

यादें हैं

कुछ खट्टी

कुछ मिट्ठी

कुछ खोने की

कुछ पाने की

कुछ देश की

कुछ परदेश की

कुछ समाज की

कुछ परिवार की

है अगर खट्टा

कड़वा, दुःखद

तो भूल जाये उसे

रखें याद

प्यार, मोहब्बत

इन्सानियत

भाईचारा

अपनापन

बस है

यहीं दौलत

इन्सान की

करें कुछ अच्छा

आने वाले

वक़्त में

जो बीता

उसे भूले

गुजरे

वक़्त में



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract