तलाश
तलाश
खो सा जाता हूँ कहीं
ना मालूम किसकी तलाश में
कहीं अपने गमों की भीड़ में
कभी मसर्रतों की आस में
खो सा जाता हूँ कहीं
कहीं दूसरों के चश्में नम
कभी कहकहों के राजे गम
कभी गुलों के इकलाख में
कहीं परिदों के परवाज़ में
खो सा जाता हूँ कहीं
कभी महफिलों के मौन में
कहीं बेजुबाँ की जबान में
कभी अपने शौकते शान में
कहीं फकीरों के ब्रह्मज्ञान में
खो सा जाता हूँ कहीं
कभी मंदिरों की पूजा में
कहीं मस्जिदों की अजान में
कभी इठलाती भोर में
कहीं काटती सी शाम में
खो सा जाता हूँ कहीं
ना मालूम किसकी तलाश में.
