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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Abstract

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

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जो गैरों के लिये अपने खो देते

जो गैरों के लिये अपने खो देते

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आज मैंने अपने दिल को समझा लिया है,

हर उस बात को मैने दिल से भुला दिया है।

तू याद न आये दिल को तय कर लिया है,

जमाने की उल्फत को मंजिल बना लिया है।


लेकिन कल और आज हद होती है,

प्यार में रुसवाई यहीं से शुरु होती है।


तुझे खुश रहना है,

तेरी खुशी मेरा गहना है।

अब परेशां नहीं करुंगा तुझे,

तेरी यादों संग रहना है मुझे।


जो गैरों के लिये अपने खो देते हैं,

वो न सुख न वो दौलत कमाते हैं।


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