थोड़ी बातें खुद से......
थोड़ी बातें खुद से......
इक और दिन ढ़ल गया
गहराता अंधियारा और ख्यालों में खोयी
कुछ ख्वाबों के पन्ने पलटती......
ना जाने कब कविताएं पास आकर कहने लगी.....
अरसे बीत गये मैं तुम्हारे शब्दों में ढ़ली नहीं
माना तुम मुझसे खफा नहीं
फिर मेरी खैर-खबर क्यों लेती नहीं
कविताएं मुझसे कहने लगी......
कविताओं की बातें मान लिखने बैठी
पर भावनायें निःशब्द हुई
उलझन में उलझी रही
मन को समझाया पर......
मन खिड़की से झांकती गरजती बरसती
अठखेलियां करती बूंदों को निहारना चाहता
रिमझिम फुहारों की सरगम में
खुद को शामिल कर गुनगुनाना चाहता
बूंदों को छू जाती हवाएं.....
मन ठंडी बयारों संग मुस्कुराना चाहता......
आज शब्दों को पिरोना नहीं चाहती
बचपन की बेफ्रिकी वाली बारिश में लौटना चाहती
भीगी भीगी मिट्टी की सौंधी खुशबू
और चौखट पे खेलते थिरकते पांव
छोटे छोटे लम्हों को जीना चाहती.......
मन.....कह रहा मन की बात
और कुछ यूं......
मैं बारिश का लुफ्त लेती
मनोभावों को पन्नों पे उकेरती
कोशिश कर रही कविता में ढ़ालने की......स्वाती
