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Devendraa Kumar mishra

Tragedy

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Devendraa Kumar mishra

Tragedy

थोड़ा जीने के लिए

थोड़ा जीने के लिए

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तलवारों के साये में चलना पड़ता है 

जीने के लिए रोज मरना पड़ता है 

खून को पानी बनाना पड़ता है 

रिश्तों के लिए रोज खुद को थोड़ा मिटाना पड़ता है 

इस शहर में अपना भी एक मकान हो 

इसके लिए जीवन भर किस्तें चुकाना पड़ता है 

शहर में दो वक़्त की रोटी के लिए 

किसी गधे को बाप बनाना पड़ता है 

महीने भर जी तोड़ मेहनत और छोटी सी पगार 

इसके लिए भी किसी को मालिक बनाना पड़ता है 

भगवान को भी आराम दिलाने के लिए 

बड़ी बीमारी देकर बिस्तर पर लिटाना पड़ता है 

महंगाई के दौर में बूढ़े बाप की बीमारी 

उठा लो भगवान, बच्चों को भगवान से कहना पड़ता है 

बेटी की शादी के लिए खर्च कर दी जमा पूंजी 

बेटा कहता है, पैदा करते वक़्त नहीं सोचा 

बेटे के भविष्य के लिए घूस खिलाना पड़ता है 

गरीब से सभी न जाने क्यों नाराज रहते हैं 

गरीब को हर मोड़ पर नजर अंदाज होना पड़ता है 

लुटने को कुछ होता नहीं गरीब के पास 

फिर भी गरीब को हर मोड़ पर लुटना पड़ता है 

अमीरों का बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए 

गरीब को हरदम चकनाचूर होना पड़ता है 

यही जीवन है, जीना पड़ता है 

थोड़ा जीने के लिए बहुत सारा मरना पड़ता है


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