स्वर्ग यहीं है..... यहीं है
स्वर्ग यहीं है..... यहीं है
उस दिन नदी किनारे बैठा हुआ था,
आँखें इधर उधर दौड़ा रहा था,
नदी का कल कल बहता पानी,
बीच बीच में बाहर झाँकते पत्थर,
पानी के बहाव से लड़ती नावें,
कहीं दूर उछाल मारती मछलियां,
श्वेत धवल हंसों का झुण्ड,
किनारे टकरा कर उछलता हुआ पानी,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
थोड़ी दूर उठकर पैदल चल दिया,
आगे कुछ पहाड़ दिखाई दिए,
पहाड़ों की विशाल तलहटी,
मानो विशाल कोई मैदान हो,
ऊँचे ऊँचे दरख़्त,
घनी झाड़ियां,
ऊपर से नीचे गिरता,
धवल झाग भरा जल,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
ऊपर विशाल नील गगन,
कहीं कहीं श्वेत स्याह बादल,
एक दूजे में समाते हुए,
कभी एक दूजे से बिछड़ते हुए,
ज़िन्दगी की हकीकत बयान करते हुए,
वह सत रंगी इंद्रधनुष,
अपनी आभा बिखेरते हुए,
जीवन का सन्देश देते हुए,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
बारिश भी तभी शुरू हो गई,
हलकी हलकी बुंदा बाँदी,
तन मन को ठंडक पहुंचाती हुई,
जीवन कि यन्त्रनाओं से उबारती हुई,
एक गुदगुदाता सा मीठा मीठा अहसास,
कभी कभी चमकती हुई बिजलियां,
बादलों की गड़गड़ाहट,
बिजली की कड़क ध्वनि,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
दूर दूर तक फैले हुए खेत खलिहान,
धानों की लहलहाती हरित बालियां,
कहीं कहीं पीत वर्ण के सरसों के खेत,
आम जामुन के ऊँचे पेड़,
नारियल के सीधे लम्बे पेड़,
बांस के ऊँचे ऊँचे झुरमुट,
बीच बीच में सरपट भागती गिलहरियां,
अंगूर की लताओं की अठखेलियां,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
और इन सबके बीच बसा था,
मेरा एक छोटा सा आशियाना,
घर के बाहर एक चबूतरा,
चबूतरे में लगा वह मचान,
निर्मल जल का भंडार वह कुआँ,
बाहर चबूतरे में नहाना,
अपनों के संग बतियाना,
गाय को नहलाना,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो,
मैंने स्वर्ग तो पहले नहीं देखा,
चलचित्र में देखा था,
ऐसा ही तो दिखाते हैं,
पर स्वर्ग तो हमारे हर ओर है,
फिर क्यों हम इस स्वर्ग को नर्क बनाकर,
दिन रात स्वर्ग की खोज में भटकते हैं?
आइये, क्यों न हम धरती के स्वर्ग को,
फिर से सहेज लें,
जीवन को खुशनुमा बना लें।
तभी मेरी नींद टूट गई,
इधर उधर देखने लगा,
आस पास फैली प्रकृति की हर कृति में,
स्वर्ग की एक अद्भुत अनुभूति हो रही थी,
सब मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
काश हम सब मिलकर धरती के स्वर्ग को बचा पाते,
संस्कारों की पुनः स्थापना कर पाते,
तो कलियुग आज ही सत युग में बदल जाता…..।
