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Archana Tiwary

Romance

4  

Archana Tiwary

Romance

सुर्ख गुलाब

सुर्ख गुलाब

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203

आज किताब के पन्नों को पलटते हुए

मिल गयी बरसों पुरानी बड़े जतन से रखी

गुलाब की सुर्ख पंखुरियां

सूख कर भी यादों की हरियाली

रखी थी बरक़रार 

रंग अब भी था सुर्ख लाल

 हरियाली में धुंधला सा चेहरा


नादानी वाली अनकही कहानी कहती

वो प्रेम का प्रतीक लाल गुलाब

ज़माने से छुपा कर दिया था उसने

मैंने भी सबसे छुपा सहेजा

किताब के पन्नों बीच

उस उम्र का प्यार छुप छुप देखना


सपनों के राजकुमार का चेहरा

उसके चेहरे से मेल खाता

दीवानगी उसकी अहसास जगाता

प्रथम प्रेम की परिभाषा समझाता

आ सामने वो गुलाब आज


गुदगुदी दिला मन को भिंगोता गया

बारिश सी ठंढक, यादों की हिलोरे देता गया 

बड़ा बेसकीमती था वो सुर्ख गुलाब।


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