सुबह और समंदर
सुबह और समंदर
सुबह और समंदर …
ये सुबह आज धुली उजली सी है
गहरा घना समंदर सामने बिछा है
ये करवट ले रहा है के बुला रहा है
शायद दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है
इन लहरों में डूब जाने को जी करता है
समंदर की सतह छूने को जी करता है
बाहर के शोर गुल से नाता छूटे कभी
पानी के शहर में बसने को जी करता है
अंदर सुकून है फिर भी ज़िंदगी चल रही है
रंग बिरंगे साथी जीव घुल मिल रहे हैं
अपने होने का मुझे अब एहसास है
हर सांस को मेरा दिल से शुक्रिया है
हाँ ज़िंदा हूँ के सांसे चल रही है
हर धड़कन का खुल के एहसास है।

