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Nitu Mathur

Classics Inspirational

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Nitu Mathur

Classics Inspirational

स्वयं से स्वाधीन

स्वयं से स्वाधीन

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वाणी नरम मगर नीयत नेक नहीं 

नीयत नेक पर वाणी सही नहीं 

सब सुख है पर खुश नहीं , कभी 

संघर्ष में भी हँसी खोयी नहीं 


मैं ख़ुद को कैसे बल दूं 

क्या ऐसा छल कर दूं 

कि सम विषम अवस्था में 

मन को शांत संतुलित रखूं 


दूसरे के प्याले में क्रोध नहीं 

प्रीत के मोती परोसूँ 

मैं स्वयं को स्थिर रखूं 

प्रेम से सराबोर रखूं 


ये सब मैं कर सकती हूँ 

थोड़ा ख़ुद पर काम करके 

बदलाव बस मुझ में करके 

ख़ुद अपने लिए आइना बन के


सकारात्मकता को दृढ़ रख के 

आशा विश्वास दृढ़ता 

प्रेम सौहार्द करुणा 

को आकर्षित करके ,


बलशाली चुंबक बन के 

भाषा की गरिमा बनाये रख के 

अपने अहम् से स्वाधीन हो के

स्वयं से स्वाधीन हो के।


~नीतू माथुर 


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