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Minal Aggarwal

Tragedy

4  

Minal Aggarwal

Tragedy

सपनों के परिन्दे

सपनों के परिन्दे

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पलकों की 

चिलमन के 

पर्दे गिरे हैं 

सपनों के परिन्दे आज 

बहुत फड़फड़ा रहे हैं 

बंद कमरे से 

निकलकर 

खुले आसमान में 

उड़ने की 

ख्वाहिश लेकर 

वह बहुत घुटे हैं 


आंसुओं के दरिया में 

तेरी यादों की नैया में 

सवार 

तेरे पीछे पीछे 

न जाने 

किस अज्ञात स्थान की तरफ 

बह रहे हैं 


एक दूरी यहां भी है 

तेरे 

फिर मेरे 

फिर सारे नजारों के

ओझल होने की 

तैयारी यहां भी है 

एक आंसू अब गिरा तो 

यह दरिया 

जज्बातों के पानी का 

सूख जायेगा 


हम नहीं रहेंगे तो 

यह मंजर फिर कौन तुझे 

दिखलायेगा।


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