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chandraprabha kumar

Romance

4  

chandraprabha kumar

Romance

सपनीले दिन

सपनीले दिन

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 सपनों में बॉंधूँगी

पूछूँगी उनसे एक दिन

हमसे है भूल हुई कहॉं

क्यों न वह आते हैं, 

हमसे बातें करते हैं,

कुछ हमारी सुनते हैं। 


अथवा यों ही पास बैठे

हम दोनों

क्यों न

मौन का ही

स्पन्दन रव 

सुनते हैं।


कहॉं बीते वे सपनीले दिन

वे हमें खोजते आयें,

मैं छिप जाऊँ

हाथ न आऊँ,

और बस यों ही

उन्हें चिढ़ाऊँ।


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