सपनीले दिन
सपनीले दिन
सपनों में बॉंधूँगी
पूछूँगी उनसे एक दिन
हमसे है भूल हुई कहॉं
क्यों न वह आते हैं,
हमसे बातें करते हैं,
कुछ हमारी सुनते हैं।
अथवा यों ही पास बैठे
हम दोनों
क्यों न
मौन का ही
स्पन्दन रव
सुनते हैं।
कहॉं बीते वे सपनीले दिन
वे हमें खोजते आयें,
मैं छिप जाऊँ
हाथ न आऊँ,
और बस यों ही
उन्हें चिढ़ाऊँ।

