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Damyanti Bhatt

Classics

4  

Damyanti Bhatt

Classics

सन्नाटा

सन्नाटा

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अधरों पर शोर

हृदय का सन्नाटा

नदी के दो किनारों जैसा

बना जीवन


बचपन मैं

भेदभाव

ससुराल के तानों से

नहीं टूटी

पर 

बुत सी बन गयी

हर धडकन मेरी

 जिंदगी मिली है

जी नहीं पा रही


जीने का सलीका नहीं आ रहा

बस जी रही हूं

सांसें चल रही हैं।


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