स्नेहसिक्त स्त्री के मुखर नैन
स्नेहसिक्त स्त्री के मुखर नैन
सर्द शीतल रातों में अपने बहुपाश में जो भरता है,
वह पुरुष स्त्री का मनवांछित सहचर बन जाता है !
अपनी सहचरी बनाकर जो स्त्री के साथ चलता है,
वह पुरुष एक मर्यादित देव पुरुष ही कहलाता है !
कुछ सपने जो स्त्री हृदय में बेहद मुलायम से होते हैं,
उसके प्रिय के स्पर्श को आकुल अरमान से होते हैं !
जीवन रथ का पहिया यूँ अकेले ना चला ना चलता है,
प्रिय के बहुपाश को मानिनी का दग्ध हृदय जलता है !
प्रणयसिक्त स्त्री की पलकों में जो लाज उतर आई है,
यह अधखुले ओष्ठों की भाषा उसे यूँ ही नहीं आई है !
उसकी मौन आमंत्रण सी देती हुई सुन्दर मुख़ाकृति में,
बेहद ही सहज़ सरल मृदु प्रथम परिणय की लूनाई है !
जाहिर है, प्रेमातुर ये अदाएं उसमें यूँ ही नहीं आई हैं,
ठेठ ऊर्जा से उमगे किसी उद्दाम पुरुष ने सिखाई है !
सर्द शीतल रातों में अपने बहुपाश में जो भरता है,
वह पुरुष उसका मनवांछित सहचर बन जाता है !
अपनी सहचरी बनाकर जो स्त्री के साथ चलता है,
वह पुरुष ही एक मर्यादित देव पुरुष ही कहलाता है !
जो पुरुष होने के दंभ से नहीं बल्कि पौरुष से विभुषित होता है,
वह पुरुष अपनी भार्या के हृदय में वास करने योग्य होता है !
प्रेम सदा सिखाता ही तो आया है, पौरुष को मर्यादित होना,
और स्त्री को स्त्रियोचित्त समर्पण से आहलादित स्त्री होना !

