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V. Aaradhyaa

Romance

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V. Aaradhyaa

Romance

स्नेहसिक्त स्त्री के मुखर नैन

स्नेहसिक्त स्त्री के मुखर नैन

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सर्द शीतल रातों में अपने बहुपाश में जो भरता है,

वह पुरुष स्त्री का मनवांछित सहचर बन जाता है !

अपनी सहचरी बनाकर जो स्त्री के साथ चलता है,

वह पुरुष एक मर्यादित देव पुरुष ही कहलाता है !


कुछ सपने जो स्त्री हृदय में बेहद मुलायम से होते हैं,

उसके प्रिय के स्पर्श को आकुल अरमान से होते हैं !

जीवन रथ का पहिया यूँ अकेले ना चला ना चलता है,

प्रिय के बहुपाश को मानिनी का दग्ध हृदय जलता है !


प्रणयसिक्त स्त्री की पलकों में जो लाज उतर आई है,

यह अधखुले ओष्ठों की भाषा उसे यूँ ही नहीं आई है !

उसकी मौन आमंत्रण सी देती हुई सुन्दर मुख़ाकृति में,

बेहद ही सहज़ सरल मृदु प्रथम परिणय की लूनाई है !


जाहिर है, प्रेमातुर ये अदाएं उसमें यूँ ही नहीं आई हैं,

ठेठ ऊर्जा से उमगे किसी उद्दाम पुरुष ने सिखाई है !


सर्द शीतल रातों में अपने बहुपाश में जो भरता है,

वह पुरुष उसका मनवांछित सहचर बन जाता है !

अपनी सहचरी बनाकर जो स्त्री के साथ चलता है,

वह पुरुष ही एक मर्यादित देव पुरुष ही कहलाता है !


जो पुरुष होने के दंभ से नहीं बल्कि पौरुष से विभुषित होता है,

वह पुरुष अपनी भार्या के हृदय में वास करने योग्य होता है !

प्रेम सदा सिखाता ही तो आया है, पौरुष को मर्यादित होना,

और स्त्री को स्त्रियोचित्त समर्पण से आहलादित स्त्री होना !




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