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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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समय के पृष्ठ पर

समय के पृष्ठ पर

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जीवन की एक तस्वीर

ठीक ठीक मनुष्य की तरह

चलती, बोलती, गुनगुनाती हुयी।

इतनी सी बात है

पर है अद्भुत

विचित्र द्विविधावों से भरी भरी

तस्वीर देखने वालों का

एक हुजूम सा है

सबकी अपनी अपनी नजर है

अपनी अपनी जरूरतें भी हों शायद

अपनी अपनी धारणाएं भी हैं

और खूब हैं

कोई खुश है

तो कोई आश्चर्यचकित

कोई डरा हुआ है तो

कोई ध्यानमग्न देखने में ही,

पर मनुष्य अजनबी सा है

और भी अजीब है न

कोई हो

और उसकी तस्वीर में

लोगों की दिलचस्पी हो

और लोग उससे दूरी बनाये हुये

मशगूल हों अपने आप में,

और हम तो विस्मय में हैं

और हैरत में भी कि

वो जो प्रेम करने वाले थे

कहाँ गये।


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