STORYMIRROR

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract Tragedy

4  

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract Tragedy

समय का स्वभाव ये भी !

समय का स्वभाव ये भी !

1 min
320

अक्सर

नजर में आकर भी

पता नहीं पड़ता की

ये धुआं है या

बस कुहासा है

समय के होम का।


अपने ही अंदर

चलती खामोश बातें

हमें साफ क्यों

सुनाई नहीं आतीं

ये शोर

किसका है

जो बहरा कर देता है

हमें उस वास्तविकता से

जो सदियों से

अनवरत

एक चक्र में चलती

आ रही है

यथा

जरा की

जन्म मृत्यु।


और तब

अहसास होता है

समय का

स्वभाव एक ये भी है,

चुपचाप

कोलाहल, कलरव के नीचे

सब धीमे धीमे

स्वाहा कर देने का।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract